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सबसे ख़ूबसूरत कविता

sabse khubsurat kavita

मधु चतुर्वेदी

मधु चतुर्वेदी

सबसे ख़ूबसूरत कविता

मधु चतुर्वेदी

और अधिकमधु चतुर्वेदी

    सबसे ख़ूबसूरत कविता

    दराज़ों में दफ़्न हो जाती है

    सच्चे हैं अश्क

    जो छुपकर काग़ज़ पर बहते हैं

    बदनसीब आँसुओं की दास्ताँ

    किससे कहे कोई?

    दर्द की बातें

    सरेआम नहीं की जातीं

    सबसे ख़ूबसूरत कविता

    दराज़ों में दफ़्न हो जाती है

    लजीले कपोलों की रक्तिम आभा

    हथेलियों की रेखाओं में खो जाती है

    झुकी-झुकी पलकों की

    गुलाबी डोरियाँ डायरी की

    काग़ज़ी ख़ुशबू में उलझ जाती हैं

    गूँगे के मुँह में

    गुड़ घुलता जाए जैसे

    संदूकों के सीप में

    महफ़ूज़ क़ैद हो जाती है

    सबसे ख़ूबसूरत कविता

    दराज़ों में दफ़्न हो जाती है

    ज़ख़्म दुनिया को कैसे दिखाए?

    सवालिया नज़रों से ख़ुद को कैसे बचाए?

    दबी सिसकियों की गूँज किसे सुनाए?

    जैसे बिजली की कौंध

    क्षण भर में ओझल हो जाए

    या कोई बच्ची

    दरवाज़े की ओट में

    सहमी छिप जाए—

    वैसे ही जग-हँसाई के डर से

    डायरी में बंद हो जाती है

    सबसे ख़ूबसूरत कविता

    दराज़ों में दफ़्न हो जाती है

    हाल-ए-दिल

    दुनिया से बेपर्दा करके

    दिल्लगी की तोहमत नहीं ली जाती

    दिल में छिपे गहरे एहसासों की

    पोशीदगी की नुमाइश नहीं की जाती

    जाँघ के तिल को कोई कैसे उघारे—

    काग़ज़ों से बातें बेलिहाज़ हो जाती हैं

    और फिर सबसे ख़ूबसूरत कविता

    दराज़ों में दफ़्न हो जाती है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मधु चतुर्वेदी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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