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साथ-साथ और अकेले

saath saath aur apne apne

अनुवाद : शायक आलोक

एलेक्स दिमित्रोव

एलेक्स दिमित्रोव

साथ-साथ और अकेले

एलेक्स दिमित्रोव

और अधिकएलेक्स दिमित्रोव

    मैंने खिड़की खोल दी ताकि लोगों की आवाज़ें सुन सकूँ

    कल रात हम साथ-साथ थे और अकेले-अकेले भी

    तुम...तुम...जॉन्स द्वारा क्रेन को समर्पित 'डाइवर' को देखते ही जाते हो

    और कुछ कहना चाहते हो।

     

    पानी में तुम एक ऐसे बच्चे हो

    जिसकी आँखें नहीं हैं

    कल समुद्र-तट पर कुछ भी नहीं था

    और किसी को नहीं मालूम कि वह कहाँ से आया।

     

    हमारे भीतर कहीं

    एक छोटा-सा जीव अटका हुआ है

    शांति के भी कुछ मिनट होते हैं

    बस यह स्पर्श

    बस इस एक बार।

     

    अतीत कहाँ जाता है

    पूर्णविराम कहाँ रखा जाना चाहिए?

    जो धरती के नीचे था

    वह उनका पीछा करता हुआ घर तक आया

    शाख़ टूट गई

    वह अपने आप टूट गई

    वह सचमुच टूटी थी जेम्स।

     

    हम वहाँ थे

    और मौन थे

    हम 'डिलीट', 'शिफ्ट', 'कमांड' जैसे थे।

    धीमे, काले रंग में

    एक नारंगी सड़क-चिह्न पर—

    हर जगह अनुपस्थित

    और अलिखित।

     

    अचानक

    एक ही क्षण में

    वह; वह किसी व्यक्ति को याद करता है

    और वह व्यक्ति अभी भी जीवित है

    मैंने तुम्हें बहुत दिनों तक याद नहीं किया

    और तुम इतने दूर जा चुके हो

    फिर वह कविता के बीच वाक्य में ही

    उससे बाहर निकल गया...

     

    तब ऐसी बातें कहने वाले हम ज़रूर 

    अकेले लोग रहे होंगे

    लेकिन अब हमारे लिए कमरे हैं

    और देखने के लिए मूर्तियाँ।

    उस निर्दोष मैदान में

    कोई सब कुछ छोड़ गया है—

    अपने आपको भी।

     

    तुम;

    तुम्हें यहीं रहना चाहिए

    यह एक क्रूर और सुंदर पतझड़ है

    अपने हाथों को रेत में

    धरती पर

    समय के नीचे रखकर

    उसने किसी और चीज़ को छुआ।

     

    लोग अधिकतर वही होते हैं

    जिसे वे सँभाल नहीं पाते

    और जो उन्हें सँभाले रखता है।

    और  फेरीज़-व्हील के गोल पिंजरे के भीतर से

    तुमने दुनिया को देखा।

     

    भाप पर,

    आईने पर,

    तुमने लिखा—

    इतना इतना इतना...

    तो अगर तुम उत्तर खोज रहे हो

    तुम यहाँ के हर जल-टॉवर को देख रहे हो।

     

    समुद्र उस चीज़ को,

    जिससे वह सबसे अधिक प्रेम करता है

    अपने नीचे क्यों छिपाए रखता है?

    भय

    निराश पैसों की दुनिया

    सारी ख़बरें

    और बे-ख़बरियाँ

    कोई कहीं भी

    हमें कैसे जान सकता था?

    हमने क्या बनाया?

     

    और तुम्हारी कुर्सी का चमड़ा 

    उसने मुझ पर अपनी छाप छोड़ दी है

    इसलिए भूलने के लिए शुभकामनाएँ।

     

    दुनिया एक घर थी

    वह निर्मम थी

    वह सच्ची थी

    वह यथार्थवादी नहीं थी

    यह सुनिश्चित करो कि यहाँ तारीख़ लिखो

    और हस्ताक्षर करो

    फिर सारी कोमल चीज़ों को बचाकर रख लो

    क्योंकि हर कोई जानना चाहता है

    कि वह कब था

    वह कैसे हुआ—

    उसके बारे में कुछ तो कहो।

     

    कैसे रात की ओलों-भरी बारिश ने

    हर जगह अपने निशान छोड़ दिए थे—

    हमारी चीज़ें

    हमारी मोहक और अद्वितीय चीज़ें।

    स्रोत :
    • रचनाकार : एलेक्स दिमित्रोव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित

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