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रेत का तूफ़ान

ret ka tufan

देवेंद्र 'देव'

देवेंद्र 'देव'

रेत का तूफ़ान

देवेंद्र 'देव'

और अधिकदेवेंद्र 'देव'

    पंच,

    अब सरपंच बनने पर अमादा है।

    बर्फ़ की,

    चट्टान का भी

    क्या इरादा है।

    रेत के तूफ़ान से

    टकराओगे,

    फिर पुरानी गलतियाँ

    दुहराओगे,

    फिर भेड़िये का डर

    हमें, दिखलाओगे?

    किन्तु,

    अबकी बार

    मेरे यार—

    अपनी प्यारी बकरियों के साथ—

    तुम भी मारे जाओगे!

    ये हमारी सीख है—

    ये अपना वादा है!

    ये, तुम्हें

    अधिकार

    किसने दे दिया है,

    जा घुसो,

    घर में किसी के,

    और उघारो वस्त्र,

    फिर,

    बड़ी निर्लज्जता से

    ये कहो,

    सब हाथ जोड़ें—

    और बोलें

    जय, तुम्हारी—

    दासता स्वीकार कर लें।

    ये तुम्हारा दम्भ है,

    कुँठा तुम्हारी, या रही होगी,

    तुम्हारे घर की रीति,

    पर किसी भी

    स्वाभिमानी राष्ट्र की

    नीति नहीं है।

    न्याय की

    कुर्सी,

    विरासत में नहीं मिलती—

    न्याय की कुर्सी,

    स्वयंवर, ख़ुद रचाती है।

    और,

    योग्य मिल जाए

    कहीं जो पात्र,

    फिर भले हो गाँव का बालक—

    न्याय की भाषा तो,

    कुर्सी ख़ुद सिखाती है।

    किन्तु,

    तुम जो कर रहे हो—

    इन हवाओं में

    जो हिंसा, भर रहे हो,

    या कि,

    जिस शब्दावली में बोलते हो—

    क्या कभी ख़ुद को भी,

    उस पर तौलते हो?

    तौलते होते,

    तो फिर

    मुस्कान पर बंदिश न होती,

    ख़ून से भीगे हुए,

    सपने न होते—

    आग आँखों में,

    जवानी के न होती।

    और, बूढ़ी देह कोई

    काँपते हाथों से,

    अपनी पीठ पर

    बंदूक का बोझा न ढोती।

    ख़ैर,

    जब कभी—

    निष्पक्ष हो,

    निर्भीकता से—

    इस वक्त का इतिहास,

    लिक्खा जाएगा।

    सभ्यता की

    इस सदी को—

    इस तरह भी

    याद रक्खा जायेगा—

    कि,

    एक ज़िंदा कौम ने

    मजबूर होकर

    मौत से बदतर भी

    अपनी ज़िंदगी—

    ऐसे बिताई थी।

    प्यास लगने पर

    पिया था तेल,

    भूख में बारूद खाई थी।

    अब,

    नहीं इंसान ये

    चलते हुए

    जैविक, रसायन,

    आणविक हथियार हैं।

    ये हैं मानव बम, मिसाइल

    जो

    लक्ष्य पर जाने को-खुद तैयार हैं।

    चीरकर

    देखोगे इनके जिस्म—

    तो अस्लाह का

    भँडार भी मिल जाएगा।

    किन्तु,

    अबकी बार का विस्फोट,

    चाहे हो कहीं—

    ये सत्य है—

    वाशिंगटन

    जल जाएगा।

    और क्लिंटन तुम!

    प्रजातांत्रिक व्यवस्था की—

    विवशता में

    पली उद्दँडता हो।

    तुम अमीरी के किसी,

    अय्याश क्षण की—

    मानसिक विकलांगता हो।

    तुम हो,

    तानाशाह,

    जो, जनतंत्र का—

    ओढ़े लबादा है।

    बर्फ़ की चट्टान का भी

    क्या इरादा है...?

    स्रोत :
    • पुस्तक : संधियाँ लेकर (पृष्ठ 111)
    • रचनाकार : देवेंद्र 'देव'
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 1998

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