रात्रि के क्षण अकेले कमरे में
ratri ke kshan akele kamre mein
पर्दे के तंतु में विचरते तारे
चुप-चुप सारी स्वर्गीय रात।
नीला-हरा प्रकाश
झिलमिल मानो जुगनू
एक चिकन से दूसरी तक,
लिली से गुलाब तक।
ओ, तारे इतने मूक चमक रहे हैं और घूम रहे हैं।
नीला गुंबद गूँज रहा है, नभ के शलभ विचर रहे हैं,
बीज बो रहा है मानव, मृत्यु चुन रही सड़े-गले फल
नीला गुंबद शैतान की उँगली पर घूम रहा है
नहीं है, नहीं है उल्लास न क़ब्र न मृत्यु!
रात्रि पूर्ण भीषण आहों से और अनिद्रा से
विछावन भी कठोर और तंग ताबूत-सा
हमारे मन सभी वहुमूल्य भस्मि-कलश हैं।
भरे हुए दर्द से, संताप से औ' राख से
हमारे अंतर में गहरा काला रहस्य सड़ रहा है।
हमारी नाड़ियों में संगीत पगला रहे हैं
और वे गाती हैं क्षुब्ध तारों की तरह :
गीत माँस के, गीत नशे में धुत और तूफ़ानी
पर्दे के तंतु में विचरते तारे चुपचाप सारी स्वर्गीय रात
और सारा कमरा बजरे पर कक्ष-सा
तारों के जल में तैर रहा है।
आंदोलित हो रहे स्वप्न जिन्हें आँसुओं ने खारा किया
काली कालोंच मृत्यु की ध्वजा फहराए चल रही।
पर्दे के तंतु में विचरते तारे चुपचाप सारी स्वर्गीय रात
और सारा कमरा बजरे पर कक्ष-सा
अंतिम रेख पर तैर रहा है।
हर स्वर्गीय रात में मृत्यु की महक है।
स्वप्नों के सिंहद्वार अँधेरी सुरंगों की भाँति काले
और मनुष्य कभी नहीं जानता
राह किस ओर जाएगी
वर्षगाँठ के उत्सव की ओर? शवयात्रा की ओर? या मृत्युभोज
को?
प्रातः सब विलीन हो जाता है मानो छाया
जिसे बादलों पर धुँधली बयार चितरती है।
हर स्वर्गीय रात में मृत्यु की महक आती है।
हम स्वप्न देख रहे हैं। हमारा रक्त जल रहा है, शरीर से भी
धुँआ निकल रहा है
और हम आकाशीय ज्वार में खिन्न बह रहे हैं।
अभी हैं अभी नहीं हैं, जैसे कि सभी कुछ! और हम सभी!
प्रकाश फिर उगेगा, चंद्रमा फिर बढ़ेगा, फल महकेंगे,
केवल हम नहीं होंगे।
हम पर आत्माएँ नए स्वप्न चढ़ाएँगी
और सब यों ही चलता रहेगा जैसे अब चल रहा है।
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 46)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : मीरास्लाव कृलैझा
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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