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रजत उपहार कविता

rajat uphaar kavita

अनुवाद : सुरेश सलिल

ओदीसियस एलाइतिस

ओदीसियस एलाइतिस

रजत उपहार कविता

ओदीसियस एलाइतिस

और अधिकओदीसियस एलाइतिस

     

    मुझे पता है कि यह सब कुछ नहीं और यह भी कि 

    जो ज़बान मैं बोलता हूँ 

    उसकी कोई वर्णमाला नहीं

     

    चूँकि धूप और लहरें भी एक अक्षरीय लिपि हैं, जिन्हें सिर्फ़ 

    निर्वासन और विषाद के काल में अर्थाया जा सकता है

     

    और हमारा देश जर्मन अथवा स्लाव आवरणों से, क्रमिक रूप 

    से ढका हुआ एक भित्तिचित्र और तुमने इसके पुनरुद्धार की कोशिश की 

    तो तुरंत जेल में डाल दिए जाओगे और ब्योरा पेश करना होगा

     

    विदेशी ताक़तों के कुलियों-कबाड़ियों की भीड़ के समक्ष सदैव 

    तुम्हारी स्वयं की महत्त्वपूर्ण भूमिका के माध्यम से

     

    जैसा कि विपदाओं के साथ दस्तूर है

     

    और तब भी आओ हम कल्पना करें बच्चों को खेलते हुए किसी 

    पुराने खलिहान में, 

    इस कल्पना को किसी चाल की कोठरी में भी रोंपा जा सकता है 

    और चूँकि हारने वाले को

    नियमों के मुताबिक़ बोलना और कुछ सच 

    दूसरों के सुपुर्द करने होते हैं

     

    लिहाज़ा अंत में वे सभी अपने हाथों में थमी हुई पाते हैं एक छोटी-सी

    रजत उपहार कविता।

     

     

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 256)
    • रचनाकार : ओदीसियस एलाइतिस
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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