रेस्टोरेंट में बैठा हूँ, नाश्ता कर चुका हूँ
raistoraint mein baitha hoon, nashta kar chuka hoon
आन्तुन षोल्यान
Antun Soljan
रेस्टोरेंट में बैठा हूँ, नाश्ता कर चुका हूँ
raistoraint mein baitha hoon, nashta kar chuka hoon
Antun Soljan
आन्तुन षोल्यान
और अधिकआन्तुन षोल्यान
रेस्टोरेंट में बैठा हूँ, नाश्ता कर चुका हूँ, समुद्र देख रहा हूँ।
(समुद्र कभी न देख पाए तुमको
शहरी रेस्टोरेंट में गंदे खाने के सामने।)
छिप जाता हूँ अख़बार में, उसे ऊँचा उठा लेता हूँ
अस्वस्थ हो उठता हूँ उस विशाल आँख के सामने।
पलट जाता हूँ दूसरी ओर, बेचैन हो उठता हूँ और दब जाता हूँ
पर समुद्र सदा मेरे सामने है, अख़बार से झाँकता है
अख़बार के काग़ज़ पर घिर आता है, चित्रों पर उँडल जाता है,
छपाई के रंगों की गंध के बजाय आती है गंध कपूर की सी।
समुद्र तो रेस्टोरेंट में जीता नहीं आँखों के सामने,
वह तो शुरू होता है वहाँ से जहाँ दृष्टि पहुँच पाती है।
और यों सदा देखता रहता है कोने से, विशाल, फ़ोकस के बाहर,
अनछिपा और तुच्छ, अस्वस्थ हूँ मैं, बेस्वाद।
इतने विशाल समुद्र के सामने आत्मग्लानि हो ही आती है।
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 159)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : आन्तुन षोल्यान
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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