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रचना

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सत्यव्रत रजक

और अधिकसत्यव्रत रजक

    समय से आया

    जो आलते की तरह गाढ़ा

    एड़ियों पर नील पड़ गया

    जिसका घाव सालता रहा

    और गर्भ की ग्रंथियाँ गलकर

    ख़ून में चुभती रहीं

    हम चुप रहे

    दुःखों का बड़ा बादामी बाघ

    घेरता रहा नदी

    अँधेरे में देह छोड़कर किधर जाते हम

    सारे देशों में सिर्फ़ देश ही थे

    स्वर्ग जल चुके जनपद-सा धधक रहा था

    और ब्रह्मा मुँह खोलकर सोए जा रहा था गहरी नींद

    उसकी नाक में मक्खियाँ घुस रही थीं बार-बार

    फिर भी वह रचे ही जा रहा था

    सोते हुए सृजन का सपना कैसे आ रहा था उसे

    हमें खाती रही यह बात सारी रात

    कि ब्रह्मा को अब तलक छींक क्यों नहीं आई

    वह क्या खाकर सोया था

    जिसे खाकर हम मर भी नहीं सकते

    ठंडी हवा ने अपनी कोई लिपि न छोड़ी

    समस्त में कैसे जिए हम

    बेरात जन्म को जीवित रहते हुए

    पानी में पत्थर जनते रहे

    वक़्त का वायस काकता रहा मुहाने पर

    सो गए अररकर सभी वृक्ष चिड़ियों पर

    हममें बैठी थी जो निर्मम पीली आँख सुबककर

    देखती रही अंत तक

    आख़िर ढल गई धातु में

    और जल-जल कर पानी का दूध हुई

    [लेकिन कविता,

    आँख कभी धातु नहीं होती

    चिड़ियों पर कभी वृक्ष नहीं सोते

    वक़्त कोई कौआ नहीं होता

    हवा को लिखना नहीं आता

    ब्रह्मा हमारे लिए कभी न था

    और उसके घर मक्खियाँ नहीं होतीं

    स्वर्ग कोई जनपद न था

    देशों में सिर्फ़ देश नहीं होते

    दुःख कोई बाघ नहीं होता

    गर्भ में कोई ग्रंथि नहीं होती

    समय कोई आलता भी नहीं होता

    और घावों पर कभी नील नहीं पड़ता…]

    स्रोत :
    • रचनाकार : सत्यव्रत रजक
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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