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रचना

rachna

जयंत शुक्ल

और अधिकजयंत शुक्ल

    और कितनी कविताएँ चाहिए तुम्हें?

    हर बार ख़त्म होती मेरी इच्छा

    कुछ रचने की

    और तुम्हारा हठ

    निर्माण का

    और उससे ज़्यादा

    उस प्रक्रिया में घुलने का।

    बहुत कुछ करने की आकांक्षा

    और कुछ करने की ग्लानि

    सब मिल जाता है तुममें

    तुमसे मिलकर

    अपने आपमें मैं इतना बड़ा होता हूँ

    कि अकेला रह जाता हूँ

    तमाम मिथकों से परिपूर्ण

    ईश्वर से भी अकेला,

    उसकी तरह नहीं है मुझमें

    अपनी ऊब को

    सृष्टि में बदलने का कौशल।

    परत-दर-परत

    खुलते जाते हैं भाव

    बनती जाती हैं बातें

    और बिखरते हैं शब्द

    विशेष विन्यस्तता में।

    लिखता हूँ इस उम्मीद में

    कि अक्षर कभी नष्ट नहीं होते

    शब्द रहते हैं जीवित,

    जीवन देते हुए

    और वाक्य करते हैं सृष्टि।

    रचना,

    जो मैं करना चाहता हूँ

    नहीं होती,

    होता है कुछ और उसका रूप

    जैसे प्रेम की कविता लिखते

    ये कुछ और ही रास्ते उतर आई है

    पर अंततः

    कवि जानता है

    अपनी कविता का मूल भाव

    जैसे मैं जानता हूँ अपना प्रेम

    उसका सान्निध्य

    और अकेलापन।

    स्रोत :
    • रचनाकार : जयंत शुक्ल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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