Font by Mehr Nastaliq Web

प्रतिकार

pratikar

रामकृष्ण परार्थी

और अधिकरामकृष्ण परार्थी

    यादि अछि

    पाँच-छह बर्खक रही त' पहिल बेर

    करौने रहय एगो बुढ़बा

    हमरा जाति-पातिक भान

    'हटले रह दुसाधसँ हड्डी छुआइत छैक'

    डाँटिक' कहि

    हमरा बालमनकेँ कयने रहय अपमान

    हम आहत भ' कनैत जाक'

    बाबूजीसँ पूछने रहिएक—

    अँय यौ बाबू, अपना सभ दुसाध छियै

    अपना सभसँ हड्डी छुआइत छै

    किनसाइत बाबूजी कतेको बेर घबाह भ'

    चुकल छलाह एहि शब्दक विषवाणसँ

    किनसाइत कतेको बेर टूटल छलनि हुनकर आत्मस्वाभिमान

    एहि शब्दरूपी पाषाणसँ

    मुदा सभ रहनि हुनकर स्वयंपर आघात

    परन्च, अपन पुत्रपर भेल आघातकेँ

    एगो पिता कोना क’ सकैत छला बर्दाश्त

    आक्रोशसँ हुनकर देह-हाथ थडथड़ाय लागल रहनि

    आँखि लाल टुहटुह देखाय लागल रहलि

    जेना धमनीक सभ शोणित चलि आयल रहनि आँखिमे

    मुदा सामाजिक-धार्मिक रस्सीसँ कसिक' बान्हल

    एगो विवश पिता कइए की सकैत छला

    सांत्वना, संवेदना, सहानुभूतिक अतिरिक्त हुनका लग

    आर की रहनि जे हमरा द' सकैत छला

    'बाउ हौ कोइ फूसि कहैत छह

    जे मनुक्खसँ मनुक्ख छुआइत छैक

    ईश्वर बनौने छथिन पाँच तत्वक सभक शरीर

    जकरा ज्ञान नहि छैक

    वैह भेद-भाव बतियाइत छै'

    बाबूजीकेँ समझौलापर हम बिसरि सकैत छलहुँ

    बालपनक अपमान

    मुदा बेर-बेर अपमानसँ टूटि जाइत अछि

    सहनशक्तिक सभ सीमान

    दुसाध-मुसहर भ' कुर्सीपर बैसि गेलै

    डोम-चमार भ' चापाकलपर चढ़ि गेलै

    तों अछूत छें, तोरा लेल मन्दिरमे प्रवेश वर्जित छौक

    तों अन्त्यज्य छें, चल उठ, भोज-भातमे

    अलग तोहर पंक्ति छौक

    अकसरहें सहय पड़ल अछि हमरा जातिय दंश

    एहि घृणित जाति-पाति वर्णव्यवस्थासँ

    एखनहुँ तक होइते रहैत छी तंग

    तखन आब अहीं कहू

    की हम अपन पिताजी जकाँ विवश भ'

    चुपचाप देखैत रही

    अपन बेटा-पोताक संग होइत अपमान तिरस्कार

    आकि एहि घृणित संस्कृतिकेँ

    कियैक नहि करी कसगर प्रतिकार?

    स्रोत :
    • पुस्तक : प्रतिकार एखन बाँकी अछि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 26)
    • रचनाकार : रामकृष्ण परार्थी
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2022

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY