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प्रगति

pragti

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    रहतइ कि आबौ गरीबी हो भैया?

    रहतइ कि आबौ गरीबी?

    खेतमे आबक भागीरथ जे चलतइ;

    माटि जे सोनाक दाना उगलतइ।

    घर-घरमे सम्पति-सुख-गंगा पुनि बहतइ।

    रहतइ कि आबौ गरीबी हो भइया?

    रहतइ कि आबौ गरीबी?

    पौतइ सुख-सुविधा सब समता-समदाने।

    मिलतइ जँ अवसर विकासक समाने।

    भोजन, घर, कपड़ा, लै दुख ने क्यो सहतइ।

    रहतइ कि आब गरीबी हो भइया?

    रहतइ कि आबौ गरीबी?

    लगतइ फल मीठो छै आशा तरुवरमे

    जागल छै देश, प्राण अयलइ हलधरमे।

    भाषण नहि, काजे किछु हमर प्रगति कहतइ।

    रहतइ कि आबौ गरीबी हो भइया?

    रहतइ कि आब गरीबी?

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 98)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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