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फूलदेई

phuldei

चैत का महीना शुरू होने से एक दिन पहले

कंडियाँ निकल गई हैं रूढ़िया दाज्यू के घर से—

सज गई है उनके कंधों पर

कुछ टुफरे, कुछ माणे, कुछ फुल कंडी लिए

चले जा रहे हैं गाँव-गाँव, घर-घर

देते जा रहे हैं कंडिया

'फूल सग्यान' आने वाली है पहाड़ में—

ख़रीद ली गई हैं फुल कंडियाँ

दे दिया गया है निसरौ रूढ़िया दाज्यू को

बाँस-रिंगाल की बनी सुंदर कण्डियों के बदले।

बच्चे उत्सुक हैं—'फूल टीपने की ख़ातिर'

ईजा ने—

गोमूत्र और गोबर से लीपकर, सुंदर बनाई फूलकंडी

बौज्यू ने उन पर चावल के माण से लिखे

'देवी देवताओं के नाम

अंकित किए शुभ चिन्ह'—

घाम में सूखकर अब तैयार है फुलकंडी

फुल बीनने के लिए,

अम्मा ने मुट्ठी भर लाल धान के चावल

रखे सबकी कंडियों में गुड़ की डली के साथ

लगाया सबको पिठ्या अछत्

भेजा साथ-साथ फूल टीपने के लिए—

'बाल मंडली को'

फूल सक्रांति से पहली शाम में

सबसे पहले बीनी गई सगिनी

फिर फ्यूँली, दूधभाती, लईया-पईया, क्वीराल

ना जाने क्या-क्या?

बहुत सारे फूल—

सब इतरा रहे हैं अपने सौभाग्य पर

जिन्हें चुन रहे हैं बच्चे अपनी फुलकंडी में

(नई कलियों को चुनती नई पीढ़ी)

कोमल हाथों से यह फूल चढेंगे

सिद्ध को, भूमिया को, नाथ को

ईष्ट, देवता, भगवती, ग्वेल को,

चढेगें घर के द्वार को (द्वार मातृका को)

ये लाएँगे

हमारे जीवन में रंग, उत्सुकता, उमंग

यूँ ही सदियों तलक़ बच्चों की

किलकारी और फूलों की सुगंध से

महकता रहेगा घर-आँगन

बीन लिए गए हैं फूल

भर चुकी है तो टोकरियाँ

हाथों में फूलकंडी थामे

बाल वृंद लौटने लगे हैं घर को

सारी फूल कंडियाँ लाकर

थान में रख दी जा चुकी हैं।

साँझ होने को आई

फूलदेयी के सपनों में

डूबने लगी है सेकंत की शाम

खाना खाकर

गुदड़ी में सो गए ग्वाल-बाल—

मुर्गे की कूंक के साथ पौ फटने लगी

सूर्य उदय हुआ

खुलने लगी नन्हीं आँखें

छोड़ने लगी हैं बिस्तर

सूर्य की पहली किरण देखकर

जुड़ चुकी हैं नन्ही हथेलियाँ

झुकने लगे हैं नन्हे सिर

मुदने लगी हैं नन्हीं आँखें

आस्था से सूर्य नारायण के सम्मुख—

बड़ी-सी बारात में बैठे

बाल भगवान

'गदाबदी महादेव' कहते हुए

दादी माँ के हाथों

नहलाए जा रहे हैं

बैंणी अपनी बारी का इंतज़ार कर रही है

नहा धोकर तौलिया लपेटे

चाक में गए हैं

दोनों बालस्वरूप—

नए कपड़े पहने

लटी में पड़ चुका है तेल, सरसों का

बट दी गई है धमेली

हो गई भाई-बैंणी की जोड़ी तैयार

फूल खेलने

थान में बैठे बूबू जी

हाथों में धूप का डयाड़ू लिए

देवताओं को घी की धूप दे रहे हैं

थान में जल रहा है दिया

सामने रखी है फूलकंडी

बूबू ने बच्चों को टीका लगाकर

रखे टोकरी में कुछ पैंसे

बच्चों के हाथों में पहली अंजुरी फूल चढ़े

देवताओं को

फिर घर की देहरियों में

फिर बिरादरों की देहरियों में

फूल-फूल भंडार भरे की पुकार के साथ

बदले में मिले बच्चों को पैसे, उपहार, गुड़-घी

आशीष जन्म भर को

ख़ुश हैं बच्चे,

ख़ुश है पहाड़,

जाने लगी है—फूलदेई

अगले साल फिर आने का वादा लेकर।

स्रोत :
  • रचनाकार : कृष्ण चंद्र मिश्रा
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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