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बागमतीक धारमे

bagamtik dharme

आरसी प्रसाद सिंह

आरसी प्रसाद सिंह

बागमतीक धारमे

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    नाओ हमर लागत जा, के जानय, कोन घाट?

    धारे-धारे भसिआइत देखइ छी अपन बाट!

    मोन पड़य लागल आइ

    गामक परिवेश फेर।

    एक मुइल नदी केर

    कारी झामर कछेर।

    आँचर धरि उखड़ल हर-फाड़क सीराक काट।

    नाओ हमर लागत जा, के जानय, कोन घाट?

    मोन जँ पड़इ अछि, तँ

    करइ अछि किछु यैह आइ,

    संगे-संग ओकरे हम

    वैह घाट डूबि जाइ।

    जतऽ नहाइत छलि रूपक ऋतुराज-ठाट।

    नाओ हमर लागत जा, के जानय, कोन घाट?

    अरहुल कनैल लाल

    पीअर सब बान्ह कात,

    भोरे-भोरे हाँजक हाँज

    मधुमाछी करैत बात;

    मंदिरमे घड़ी-घंट बाजइ छल, जी उचाट।

    नाओ हमर लागत जा, के जानय, कोन घाट?

    गेल पानि, जे बहैत

    खल-खल छल धुआँ-धार।

    मोइन भेल, मरने जल,

    पीलु जोंक सेमार।

    गाछी, कुंज, गोचर अगोचर सोझे-सपाट।

    नाओ हमर लागत जा, के जानय, कोन घाट?

    आइ आब एके बेर

    साओनमे मेघ-संग

    बजबइ अछि बागमती

    नाचि-नाचि जल-तरंग।

    दुनू दिस लागइ छै हरियर चुनरीक हाट।

    नाओ हमर लागत जा, के जानय, कोन घाट?

    कानसँ सुनैत आबि

    रहलौं, से देखि आब

    आँखिसँ झड़ैत अछि

    मोतिया, जूही, गुलाब।

    गाबि गेल गीत जे दुआरिसँ कतेक भाट।

    नाओ हमर लागत जा, के जानय, कोन घाट?

    पोछि लेत मुँह मखान—

    पातसँ अपैत काल;

    तलफलैत माछ कतऽ

    जैत तोड़ि महा-जाल?

    भरल छै चिरैन गन्ध, टूटल छै पड़ल खाट।

    नाओ हमर लागत जा, के जानय, कोन घाट?

    मेलामे घूमि देखि

    लेलिऐ हर रंग, नाच।

    खेल खेल लेलिऐ सब

    संसारक झूठ-साँच

    आब उठइ अछि रंगमंचक परदा विराट।

    नाओ हमर लागत जा, के जानय, कोन घाट?

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 84)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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