औरतें…
कभी-कभी सभ्यता-संस्कृति के बोझ को
ज़मीन पर रखकर
सभी रिश्तों को अर्गला पर टांगकर
अपने होने के वजूद के साथ
सिंगारदान के सामने खड़ी होकर
केवल बीतते वक्त के उम्र को नहीं निहारती
बल्कि दुनिया को ख़ुबसूरत बनाने वाली
उस अहसास को निहारती हैं
जो—आँखों में भरती है
गुनगुनी प्रेम बनकर…
जो सुबह की मुस्कुराहटों में शहद बनकर घुलती है
और शाम की शोखियों पर चाँद बनकर उतरती है
थोड़ी संवरती हैं, थोड़ी बनती हैं, थोड़ी-थोड़ी ढूँढ़ती हैं
ख़ुद को हर जगह से—
और होंठों से गुनगुनाती हैं
एक ख़ुबसुरत-सा गीत अपनी दुनिया में
वे आज़ादी की बात नहीं करती
महसूस करती हैं उसे अपने भीतर
रोशनी की तरह…
सोचतीं हैं—
उम्र का हरेक पड़ाव उनका अपना है
जहाँ प्रत्येक संबंध—
उनके अस्तित्व से इतर है
ना हो बेशक दुनियादारी की समझ
लेकिन अपने भीतर इस परकीया—भाव को देखना
दुनिया में एक क्रांति लाने-सा विचार है!
- रचनाकार : गरिमा सिंह
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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