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परिचयहीन मुझे रहने दो

parichayhin mujhe rahne do

नंद लाल 'क़ैदी'

नंद लाल 'क़ैदी'

परिचयहीन मुझे रहने दो

नंद लाल 'क़ैदी'

और अधिकनंद लाल 'क़ैदी'

    परिचयहीन मुझे रहने दो

    अता-पता खो गया राह में

    जीवन बीता आह-वाह में

    घनी नीम की छाया शीतल

    इसी तरह मुझको बहने दो

    परिचयहीन मुझे रहने दो

    विश्वासों की जड़ें खोखली

    इनको हरी-भरी होना है

    श्रद्धा भाव जहाँ होता है

    लहरों से मुझको लड़ने दो

    परिचयहीन मुझे रहने दो

    'मैं' की सत्ता, 'तू' की सत्ता

    इनके मिल जाने से ही

    जम जाती प्रभु की सत्ता

    हर इक द्वार पुनः सजने दो

    परिचयहीन मुझे रहने दो

    उन्हें समझ में जो आती हो

    मैं क्या हूँ? क्या बतलाऊँ

    मेरे बारे में जो कहती—

    दुनिया उसको कह लेने दो

    परिचयहीन मुझे रहने दो

    स्रोत :
    • पुस्तक : आ गई फिर से सुबह (पृष्ठ 37)
    • संपादक : अब्दुल बिस्मिल्लाह
    • रचनाकार : नंद लाल 'क़ैदी'
    • प्रकाशन : परिकल्पना, दिल्ली
    • संस्करण : 2022

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