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पराए शहर की बारिश

paraye shahr ki barish

मधु चतुर्वेदी

मधु चतुर्वेदी

पराए शहर की बारिश

मधु चतुर्वेदी

और अधिकमधु चतुर्वेदी

    भर सावन

    पतझड़-सा सहते हुए

    हम घर से बहुत दूर रहते हैं

    उड़ते बादल बतलाने आए होंगे—

    तेरी सूनी छत को सहलाकर आए होंगे

    माँ ने भीतर ही भीतर

    गृहस्थी सँभाली होगी

    पिता ने कमरे में रस्सी बाँधकर

    गीली धोती फैलाई होगी

    बच्चों से बिछोह

    दोनों चुपचाप सहते होंगे

    कि बहुत दूर घर से हम रहते हैं

    आँगन का सन्नाटा,

    नन्हा तुलसी बिरवा—

    बौछारों में अकेला ही लहराता होगा

    फुहारों के नन्हे क़दम कभी-कभी

    सूने दालान तक पहुँचे होंगे

    बिफरे बादलों की सिंह-गर्जना

    आँगन का सन्नाटा चुपचाप सुनता होगा

    ऐसी बारिश में घर याद आता है

    कि बहुत दूर घर से हम रहते हैं

    वह चौरा

    माता के देवालय का भीगता होगा

    किसी शिलालेख-सा

    अटारी के झज्जे से पानी

    चुनरी बनकर उतरता होगा

    करेले की क्यारी से

    पानी के रेले बहते होंगे

    काले पत्थर वाले बरामदे में

    अब नहीं कूदते,

    नहीं भीगते,

    नहीं छींटते हम

    ऐसी बारिश में

    घर याद आता है

    कि बहुत दूर घर से अब हम रहते हैं।

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