सावन के सतझड़
भादो की काली रातें विदाकर
आ पहुँचा असोज
घाम तेज हुआ
वर्षा ऋतु चली गई
झुकने लगी कौंणी की बालें
छितराने लगा मँडुवा
मास-भट्ट, सोयाबीन, रेंस मोट की फलियाँ
बीजों से भर आई
घास के फूल कुम्मर बनने को तैयार हैं लटकने लगा गोड़िया
अब चौमासी गधेरों का सुसाँट
भुभांट कम हुआ
गैंडे की खाल तक सुखा देने वाले असोजी घाम पड़ने लगे
बाड़े-खौड़ौ में साग-पात की रनमन हो रखी है
ककड़ी…तुमड़े…गधुए…तोरी…मूला…
लौकी की बेलों ने
भीड़ों लेकर धूर तक
छोप रखा है
दरातियाँ, कुदाल, निसूड़े, थमाल, लुहार के आफर से
धार लगाकर लाए जा चुके हैं
सबसे पहले चौलाई की लवाई शुरू हुई
फिर मडुवे की बारी आई
अब माणी जा रही है धान
गहत-भट्ट-सोयाबीन को अभी
20- 30 दिन का इंतज़ार करना होगा
आजकल ईजा की सुबह
कुछ जल्दी हो जा रही है
और रात अधिक देर में
घर में बच्चे से लेकर बूढ़ा
आजकल सब की रेल बनी हुई है
गोड़िया काटा जाने लगा है
फैलाकर सुखाने डाला गया है
फिर पूले बनेंगे
तब बनेंगे लूटे
इन्हीं लूटों के सहारे कटेगा ह्योंन
घाम के साथ-साथ काम की भी चपेट पड़ी है
लोगों को देखा-देखी काम करने की हौंस बढ़ती जा रही है—
बढ़ता जा रहा है काम —
कटता जा रहा है असोज।
- रचनाकार : कृष्ण चंद्र मिश्रा
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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