पाँव के अँगूठे से ज़मीन कुरेदती स्त्री
paanv ke anguthe se zamin kuredti stri
सोनू यशराज
Sonu Yashraj
पाँव के अँगूठे से ज़मीन कुरेदती स्त्री
paanv ke anguthe se zamin kuredti stri
Sonu Yashraj
सोनू यशराज
और अधिकसोनू यशराज
बुद्ध के ठीक सामने
श्रावस्ती के विशाल प्रांगण में
नीचे मुँह किए बैठी एक मौन स्त्री
पाँव के अँगूठे से ज़मीन कुरेदती है
अभी-अभी ये स्त्री
सह कर आई है तीक्ष्ण निगाहों के चाबुक
क्यों—कहाँ—कब तक चली सवारी जैसे जुमलों के जवाब देकर।
ये स्त्री जब थी अबोध कन्या
तब चपल हिरनी-सी, भय और सीमाओं से परे
उर्जा-चेतन पुंज, सभी को तरंगित करती
फूलों में सुवास, बादल में पानी , पंछियों में गीत और जीवन में संगीत
जिसकी पुलक से थी सभी में जीवन की ललक।
आज बुद्ध के सामने बैठी ये तटस्थ स्त्री
खोद देगी देखना
रूढ़ियों की ज़मीन।
- रचनाकार : सोनू यशराज
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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