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ओ नव वितण्डा

o nav vitanDa

रघुनाथ मुखिया

रघुनाथ मुखिया

ओ नव वितण्डा

रघुनाथ मुखिया

और अधिकरघुनाथ मुखिया

    एखन धरि तँ

    अकास सीबिकऽ

    समुद्रो उपछि देलियैए

    बस आब ढाहय पड़तै

    हिमालयक कपार

    बान्हय पड़तै आड़ि

    उजाड़य पड़तै

    कैलाशक शिखर

    बेढ़ीसँ बेढ़य पड़तै

    गंगोत्रीक मुँहथरिकेँ

    एकबेर घेरय पड़तै

    हाहाकार मचेबाक लेल

    जरूरी छै सभ

    पृथ्वीक ध्रुवकेँ उनटाकऽ

    फेरसँ किल्लियो ठोकबाक

    जरूरति पड़ि सकैए

    वैज्ञानिक लोकनिकेँ

    खियायल धूरी

    बियरिंगकेँ

    बदलि देब

    ग्रीसिंग ऑयलिंग

    सेहो जरूरी होइत छै

    व्यवस्थाक परिवर्तन लेल

    तखन गप्प यैह जे

    ओहिखन आबि सकैए भूचाल

    धरती फाड़ि कऽ

    शोणितोक आबि सकैए बाढ़ि

    मचि सकैए हाहाकार

    एकहि संग

    सुनामी फैलिन मिज्झर भऽ कऽ

    ठाढ़ कऽ सकैए

    कोनो नव वितण्डा

    करेजमे पैसि सकैए हुदहुद

    तखन गढ़य पड़त

    अपने लोकनिकेँ

    एकगोट नव शब्द

    जखन सुरुजक सामर्थ

    सोंखि लेतै विज्ञान

    तखन दलमलित हेतै ब्रह्माण्ड

    कोनटा बाटे पड़ेताह सुरुज

    नाङर भऽ जेतनि सातो घोड़ा

    टूटि जेतनि रथक धूरी पहिया

    तखन वैज्ञानिक लोकनि

    लड़ाकू विमानपर सवार भऽ

    खेहारने फिरताह सुरुजकेँ

    ढोलहा पिटने जेताह—

    पड़ाउ ने

    कतय धरि पड़ाइ छी

    पछोड़ नहि छोड़ब

    पछुआर धरि

    पछाड़िकऽ रहब

    सैह कहलहुँ जे

    अहाँ जतय ठाढ़ छी ने

    कतहु ओत्तहिसँ ने

    श्रीगणेश होअय नव वितण्डा

    तखन देखैत रहब

    अहाँ कखन धरि

    एक हाथें पाग पकड़ि

    दोसर हाथें

    ढेका सम्हारने रहब?

    स्रोत :
    • पुस्तक : झुझुआन होइत गाम (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 95)
    • रचनाकार : रघुनाथ मुखिया
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2018

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