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निष्क्रियता का विधान

nishkriyta ka vidhan

आशीष गौड़

आशीष गौड़

निष्क्रियता का विधान

आशीष गौड़

और अधिकआशीष गौड़

    एक पूरी नज़र से

    कितना दूर देखा जा सकता है?

    एक बार की नज़र में

    कितना समा सकता है?

    दूर से भी दूर देखते रहने की क्रिया

    बिना पलक झपकाए

    सोचते रहने की वेदना है।

    देखते रहने की चेष्टा

    इसे संवैधानिक बनाती है।

    वेदना को चेष्टा की उपाधि देना

    सालों के अर्जित व्याध को नहीं दर्शा सकती।

    सूखी आँखें भी

    सुचारु रूप से जल छोड़

    ऊहापोह को पवित्र कर देती हैं।

    बाहर की दुनिया में

    सब कुछ देख पाने की क्रिया में

    कुछ भी देखना ही

    कुछ नहीं करना है।

    पंछी भी

    कितनी ही गहरी सोच में

    सारे-सारे दिन

    आसमान की ओर नज़र किए

    एकटक बैठे रहते हैं।

    दाना-पानी भर

    पंछी की उड़ान का औचित्य नहीं होता।

    कुछ नहीं कर पाने में ही

    निहित है नियति।

    जो बहुत कुछ कर लिए जाने से

    बड़ी साधना है।

    ख़ुद को बचाए रखने के उद्देश्य से

    कुछ नहीं करने की क्रिया

    इस पूँजीवादी समाज में

    स्वायत्तता का आधार है।

    निष्क्रियता का विधान है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : आशीष गौड़
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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