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नींद के सपने

neend ke sapne

विशाल कुमार

विशाल कुमार

नींद के सपने

विशाल कुमार

और अधिकविशाल कुमार

    मुझे नींद के सपने आते हैं,

    गहरे अवचेतन में उतरने के सपने,

    सोच के भँवर से निकलने के सपने,

    सपने,

    गहरी नींद के सपने।

    फेरता हूँ करवटें,

    कभी आँखें खोलकर,

    कभी आँखें बंद कर,

    कभी आँखें मींचकर,

    करता हूँ प्रयास

    उतरने का

    अँधेरे, शांत अंतर्मन में,

    गहरे तल में, जहाँ स्थिरता हो,

    नींद की प्यारी झपकियों की कोमलता हो।

    नींद स्वतः आती है,

    बिन बुलाए आती है।

    नींद का आना कोई चमत्कार नहीं,

    नींद तो अनायास आती है,

    नींद बिन प्रयास आती है।

    फिर मुझे क्यों नहीं आती नींद?

    क्या नींद का आना रोग है?

    रोग तो दिखते हैं—

    कैंसर, मधुमेह, गठिया,

    इनके बिगाड़ और सुधार दोनों ज्ञात हैं,

    नींद का आना

    अभी भी अज्ञात है।

    उससे ज़्यादा अज्ञात है

    इसे बयाँ करने की भाषा।

    कैसे बताऊँ,

    डरता हूँ उस सुबह से,

    जिस सुबह की रात ही नहीं,

    क्योंकि छूट जाता है

    सुबह और रात के अंतराल में बहुत कुछ।

    कैसे कहूँ,

    डरता हूँ उन रातों से

    जिन रातों में सपने नहीं होते।

    मुझे सपनों के सपने आते हैं,

    मुझे नींद के सपने आते हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : विशाल कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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