प्रजावर्गकेँ पड़ल प्रयोजन
prjavargken paDal prayojan
चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
Chandranath Mishra 'Amar'
प्रजावर्गकेँ पड़ल प्रयोजन
prjavargken paDal prayojan
Chandranath Mishra 'Amar'
चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
प्रजावर्गकेँ पड़ल प्रयोजन।
अपनामे अपनैती चाही,
भदै-अगहनी-चैती चाही,
दूध-दूध आ पानि-पानि लय गामेमे पंचैती चाही।
खेतक खेत पटौनी चाही,
नहरिक नङड़िसटौनी चाही,
फुर्र-फाँइमे उड़बऽवाली घरनी नहि बिलटौनी चाही।
सुन्दर, स्वच्छ घराड़ी चाही,
आ निष्पक्ष भँड़ारी चाही,
काज कतेको पैघ रहओ नहि, लाम-काफ सरकारी चाही।
मनी झड़य से बीया चाही,
दुन्ना नहि, दूतीया चाही,
थोड़ो सन हो, नीक-निकुत हो, किन्नहुँ ने ए छीया! चाही।
बेटी नहि अगतीया चाही,
बेटा नहि पछतीया चाही,
एकेटा हो, मुदा अन्हारक घरमे जरइत दीया चाही।
हृदय-पवित्र पड़ोसी चाही,
संयत कमला-कोसी चाही,
देहक नापेँ वस्त्रक संगहि पेटक नापेँ चाही भोजन।
प्रजावर्गकेँ यैह प्रयोजन।
- पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 323)
- संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
- रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 2025
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