चलना चाहिए

नवल शुक्ल

चलना चाहिए

नवल शुक्ल

और अधिकनवल शुक्ल

    हमें चलना चाहिए

    पूरी पृथ्वी पर सही

    अपने देश की इसी धरती पर

    जो बहुत बड़ी है, बहुत फैली हुई

    बर्फ़ के लुप्त होते पहाड़ और समुद्र की प्रागैतिहासिक उछाल के बीच

    चलना चाहिए

    दरवेश की तरह नहीं

    पर्यटक की तरह

    उतप्त आत्मा की तरह

    सुनी-सुनाई जगहों

    पवित्र स्थलों, बदहवास लोगों के बीच

    रोग-शोक में डूबी जगहों

    और अशांत टुकड़ों के पास

    मेरे हमदम, मेरे प्यारे

    मेरे उजाड़ जगहों के साथियो

    खो गए जंगलों और लुप्त पहाड़ों की तरह

    जगह-जगह से अच्छे दिन बदलते जा रहे हैं

    सूरज सुबह उठने पर

    रात डूबने पर आकाश

    हम देखते हैं जैसा

    काश! बचा होता वह वैसा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दसों दिशाओं में (पृष्ठ 31)
    • रचनाकार : नवल शुक्ल
    • प्रकाशन : आधार प्रकाशन
    • संस्करण : 1992

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