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काश्मीर सुषमा

kashmir sushama

श्रीधर पाठक

श्रीधर पाठक

काश्मीर सुषमा

श्रीधर पाठक

और अधिकश्रीधर पाठक

    प्रकृति यहाँ एकांत बैठि निज रूप सँवारति।

    पल पल पलटति भेस, छनकि छवि छिन छिन धारति॥

    विमल-अंबु-सर-मुकुरन महँ मुख-बिब निहारति।

    अपनी छबि पै मोहि आपही तन-मन वारति॥1॥

    सजति, सजावति, सरसति, हरसति, दरसति प्यारी।

    बहुरि सराहति भाग पाय सुठि चित्तरसारी॥

    बिहरति विविध-विलास-भरो जोबन के मद सनि।

    ललकति, किलकति, पुलकति, निरखति, थिरकति बनि ठनि॥2॥

    मधुर मंजु छबि पंज छटा छिरकति वन-कु'जन।

    चितवति, रिझर्वात, हँसति, उसति, मुसुक्याति, हरति मन॥

    यहँ सुरूप सिंगार-रूप धरि धरि बहु भाँतिन।

    सर, सरिता, गिरि, सिखर, गगन, गह्वर, तरुवर, तृन॥3॥

    पूरन करिबे काज कामना अपने मन की।

    किंकरता करि रह्यो प्रकृति-पंकज-चरनन की।

    चहुँ दिसि हिम-गिरि-सिखर, हीर-मनि मौलि-अवलि मनु।

    स्रवत सरित सित-धार, द्रवत सोइ चंद्रहार जनु॥4॥

    फल-फूलन-छबि छटा छईं जो बन-उपवन को।

    उदित भई मनु अवनि-उदर सों निधि रतनन की॥

    तुहिन-सिखर, सरिता, सर, विपिनन की मिलि सो छबि।

    छईं मंडलाकार रही चारहुँ दिसि यो फबि॥5॥

    मानहु मनिमय मौलि-माल-आकृति अलबेली।

    बाँधी विधि अनमोल गोल भारत सिर सेली॥

    अद्धचंद्र सम सिखर-सैनि कहुँ यों छबि छाई।

    मानहुँ चंदन-धौरि, गौरि-गुरु, खौरि लगाई॥6॥

    पुनि तिन सैनिन बीच वितस्ता-रेख जु राजति।

    वैष्णव श्री अरु शिव-त्रिशूल की आभा भ्राजति॥

    हिम सैनिन सों घिरचौ अद्रि-मंडल यह रूरो।

    सोहत द्रोणाकार सृष्टि - सुखमा - सुख पूरों॥7॥

    बहु विधि दृश्य-अदृश्य कला-कौशल सों छायो।

    रक्षन निधि नैसग मनहुँ विधि दुर्ग बनायौ॥

    अथवा विमल बटोर विश्व की निखिल निकाई।

    गुप्त राखिबे काज सुदृढ़ संदूक बनाई॥8॥

    कै यह जादू भरी विश्व-बाजीगर थैली।

    खेलत में खलि परी शैल के सिर पै फैली॥

    खिली प्रकृति-पटरानी के महलन फुलवारी

    खुली धरी कै भरी तासु सिंगार पिटारी॥9॥

    कै यह विकसित ब्रह्म बाटिका की कोउ क्यारी।

    योगिराज ने यहाँ योग बल ऐंचि उतारी॥

    किधौं चढायौ धाता ने भारत के मस्तक।

    माया-मालिनि-रच्यो चारु कुसुमन को गुच्छक॥10॥

    काम-धैनु कै रवि-हय की खुर-छाप सलौनी।

    कै बसुधा पै सुधाधार ब्रह्मदेव-द्रौनी॥

    परमपुरुष की पटरानी माया को स्यंदन।

    मंडप छत्र उतारि थप्यौ, उतरौ कै नंदन॥11॥

    कै जब लै सिव चले दक्ष तनया के अंगन।

    गिरि-शृंगन गिरि खिल्यौ प्रिया के कर को कंगन॥

    विष्णु नाभितें उग्यौ सुन्यौं जो कमल सहसदल।

    कै यह सोई सुभग स्वयंभू को सुजन्म थल॥12॥

    सुरपुर अरु सुरकानन की सुठि सुंदरताई।

    त्रिभुवन-मोहन-करनि, कविन बहु बरनि सुहाई॥13॥

    सो सब कानन सुनी, किंतु नंनन नहि देखो।

    जहें तहें पोथिन पट्टी, पै स् परतच्छ पेखी॥

    सो, कवियन जो कही, कलित सुरलोक-निकाई।

    याही कौं अवलोकि एक कल्पना बनाई॥14॥

    सुरपुर अरु कश्मीर दोउन में को है सुंदर?

    को सोभा को भौन, रूप को कौन समुदर?

    काको उपमा उचित देन दोउन में काकी?

    याकौं सुरपुर की, अथवा सुरपुर कौं याकी?॥15॥

    याको उपमा याही की मोहि देत सुहावै।

    या सम दूजौ ठौर सष्टि में दृष्टि आवै॥

    यही स्वर्ग सुरलोक यही सुर-कानन सुंदर।

    यहि अमरन को ओक, यहीं कहूँ बसत पुरंदर॥16॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : श्रीधर पाठक
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए पल्लव द्वारा चयनित

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