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नदी

nadi

अनुवाद : राजेन्द्र प्रसाद मिश्र

व्यथित स्पर्धा की वीरान नदी

रो मत तू।

खिसक जा और भी वीराने में

सघन पाताल में।

युग-युग से सहेजे

आँसुओं की बूँदों से

गढ़ी हैं तेरी अनुरागिनी सिसकियाँ

तेरा सदा पवित्र

समर्पित स्नेह।

तू तो जानती है

अँधेरे की अंतिम घड़ी ही

सूर्य के जन्म का समय है

मोम की चारदीवारी

पिघलेगी ही पिघलेगी।

शंख तेरी संपत्ति है

रत्न तेरा गर्भ

जलांजलि तेरा जीवन।

रो मत तू,

स्पर्धा से व्यथित

प्राण-उच्छ्वासमयी

निरोच्छल वीरान नदी,

अब उतर आएगा

एक सागर

तेरे अनाहत मातृत्व के लिए।

स्रोत :
  • पुस्तक : विपुल दिगंत (पृष्ठ 112)
  • रचनाकार : गोपालकृष्ण रथ
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी
  • संस्करण : 2019

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