मुश्किल से शुरू हुई दुनिया

कुँवर नारायण

मुश्किल से शुरू हुई दुनिया

कुँवर नारायण

और अधिककुँवर नारायण

    वह बीच सड़क पर चल रहा था

    हाथ में अपनी जीत का झंडा लिए

    और नारे लगाता हुआ

    यह मानकर कि उसके पीछे

    उसके समर्थकों का जुलूस है

    तमाशाई नहीं

    ग़दर के लखनऊ से भी ज़्यादा पुराना

    शायद वह तब का था

    जब अवध के नवाबों की राजधानी

    फ़ैज़ाबाद थी, या और पहले का

    जब अयोध्या बसी किसी पुराकाल में

    वरना कैसे होते उसके अंदर

    ऐसे-ऐसे पवित्र खँडहर,

    बीहड़ और पेचदार गलियाँ,

    भुतही-इमारतें, टूटी-फूटी सड़कें,

    अँधेरी बेहाल जगहें जिनका ओर-न-छोर,

    कैसे होता वह ज्वालामुखी अतल अंधकूप

    जिसमें झाँकते ही चक्कर जाता,

    कैसे होते वे तमाम लोग उसकी दुनिया में

    जो आते—बसते—और चल बसते—

    अपने माल-असबाब जहाँ-तहाँ छोड़कर।

    एक डरावना पशु जब भी

    एक डरे हुए प्राणी पर झपटता

    उसके उत्खनन के लिए प्रेरित होता हूँ

    एक पुरातत्ववेत्ता की तरह :

    किसी भी पुरानी या नई बस्ती में

    जब भी आग लगती

    तब मिट चुकी सभ्यता के सुराग़ खोजते हुए

    जो तथ्य हाथ लगते उन्हें देखकर

    हैरत से डूब जाता हूँ एक रहस्यमय चुप्पी में

    जैसे समुद्रतल में निमग्न कृष्ण की द्वारिका।

    समय की सत्ता तो आत्यंतिक है।

    प्रावेशिक : संग्रही, विग्रही :

    शायद वह केवल वैचारिक है जिसकी

    विराट निरावधि में

    बल खाते असंख्य ब्रह्मांडों को

    केवल किसी अनुमान-दृष्टि से ही देखा जा सकता है!

    एक मारक विषाणु की तरह

    अपने ही शरीर के गढ़ में घुसकर

    भारी मारकाट मचाती हुई विनाश-लीला

    इतिहास नहीं, एक दुःस्वप्न है—

    एक सुस्त अजगर की तरह ख़ुद को ही

    अपनी दुम की ओर से निगलने लगना

    किसी भौगोलिक अ-घटना के कश में

    खिंचकर समा जाना है

    काल के खोखले विवर में पुनः

    एक ऐसी सृष्टि का जो अभी

    मुश्किल से शुरू ही हुई है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : प्रतिनिधि कविताएँ (पृष्ठ 122)
    • रचनाकार : कुँवर नारायण
    • प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
    • संस्करण : 2008

    संबंधित विषय :

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY