ईश्वर जब बाँट रहा था जीवन को सब ज़रूरी सामान
उसने एक बड़े-से पोले में से
ज़रा-सा धागा तोड़कर देते हुए कहा था
यह मोह का धागा है
इतने में ही बाँध सको जितना, बांध लेना
मैं अपनी प्रकृति के हिसाब से थोड़े और की इच्छा लिए
खड़ी रही थी बड़ी देर तक वहीं
मगर ईश्वर ने कहा—यही है जो है सो।
इसी से जीयो जीवन
इतने में ही बांधो सब बंधन।
बड़ी डोर में अधिक बांध लोगे जब
तब नहीं आ पाओगे आराम से वापस
लौटकर आने के लिए तुम्हारा हल्का रहना ज़रूरी होगा।
मैं मोह का वह डोर लिए जब आई यहाँ
हमेशा साथ लिए रखा उसे अपनी जेब में
जैसे ही कोई दिखता अपने-सा
डोर पसार उसे बांधना चाहा
मगर हाय! हर बार कसमसा कर
सबने इतना तोड़ डाला उसे कि
अब बची नहीं ज़रा-सी भी वह पूरी सलामत
जहाँ-तहाँ से गिरहें पड़ चुकी हैं उसमें।
इस दुनिया में रहने के लिए एक वही कड़ी थी
जो ईश्वर ने दे भेजा था यहाँ मुझे
इतनी खंडित हो चुकी है वो कि
कुछ बांध नहीं पाती हूँ उससे संपूर्ण
सब टूटे हुए को जोड़ कर करती हूँ फिर-फिर कोशिश कि
इस धरती पर रहने के लिए बांध सकूँ ख़ुद को किसी कारण से
मगर हर बार कसमसा कर तोड़ जाता है उसे कोई।
तुम जब आए तो लगा तुम हो सकते हो कारण
प्रेम का मूर्त रूप था तुममें
निराकार का साकार था तुममें
तुम बात कर सकते थे तुम बात सुन सकते थे
तुम्हारे सामने हँस सकती थी
रो सकती थी केवल तुम्हारे सामने
मोह के सब टुकड़े जोड़ सोचा तुमसे बांध लूँ
लंगर फेंक किनारों पर बंधे जहाज़-सा।
मगर तुमने भी वही किया
तोड़ दिया एक बार फिर ईश्वर का दिया मोह का धागा
अब फिर जहाज़ बिना लंगर के पानी में है
ज़रा-सा तूफ़ान आना है कि बह जाएगा यह अथाह अनंत में
मोह के सब टूटे बन्धन छोड़।
मैंने बहुत चाहा मैं यहीं रहूँ
दुनिया के इसी किनारे पर
मगर हर बार की टूटी हुई मैं
थोड़ा और दूर होती गई हूँ किनारे से
अब यह धरती अपनी-सी नहीं लगती
अब नहीं लगता कुछ ऐसा जिससे बांध सकूँ
अपने मोह का धागा
सबके आने-जाने ने मुझे थोड़ा और निर्मोही बना डाला है।
- रचनाकार : ऐश्वर्या तिवारी
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.