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मिथिला-भूमि पर कौरव...

mithila bhumi par kaurav. . .

बिभा विमर्श

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मिथिला-भूमि पर कौरव...

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    जहिया धरि जीलाह बाबा

    खूब सुनबैत रहथि ओहि सझीबा

    सबिकाहा खंतीक खिस्सा-पिहानी सभ...

    हुनकर खिस्सामे

    घुमि अबैत छलहुँ हम सभ सगर मिथिला

    अपन विभूति सभसँ होइत छलहुँ परिचित

    से एना लगैत छल, जेना हुनक

    खिस्सा हमहीं सभ नहि सुनि रहलहुँ

    अपितु हमरा सभ संग उपस्थित भऽ गेल छथि

    हमर सभक पूर्वज सेहो!

    आह!

    कतेक रमनगर दिन रहल होयत

    जहिया अखंड मिथिला रहल होयत जीवंत

    एकहि मोतीक मालामे

    गाँथल छलैक हमर परिवार

    से कोना अधिया देलकै माला

    दुनू मालाक लॉकेटपर

    लगा देलकै अपन-अपन मोहर, आह!

    जाहि चासपर कहियो

    घुमैत छलाह हमर पुरखा एकट्ठे

    दियमानसँ ताहि ठाम

    बेधि देलकै बेल-अमतीक काँट,

    ठाढ़ कऽ देल गेलै सिपाही दुनू ठाम

    हम सभ बँटि गेलिऐ

    एहि पार ओही पारक विशेषण संग

    मुदा एतबोपर नहि भेलै संतोख

    ओहि अधिया मालाकेँ सेहो तोड़बाक

    लुटबाक होइत रहलै अनेक जोगाड़

    ठाढ़ कयल गेलथिन अनेक शकुनी, जे

    अनेक प्रकारे करैत रहलथिन षडयंत्र

    कहियो भाषा विवाद, तँ

    कहियो जातिवादक विष वमन कऽ कऽ...

    से वर्षोसँ रचाइत व्यूह

    एकदिन फोड़िये देलक घर

    दुर्योधन-मन सभकेँ दिमाग पर

    बन्हा गेलैक अंधताक करिक्का पट्टी

    गद्दीपर बैसल धृतराष्ट्र

    आँखिये टा नहि बन्हने छथि

    कानो पर धऽ लेने छथि पहाड़क पाथर

    भऽ गेल छथि आत्मलीन...

    आइयो पाथर भेल छथि भीष्म

    नहि फुजि रहल छनि बकार एखनो

    दुनू आँखिसँ देखैत मारि लेने छथि गुबदी

    हुनकहि आगू तोड़ल गेल माला

    बाँटल गेल विरासत

    फेकिकऽ दऽ देल गेल किछु मोती

    जाहि मोतीक माला आब

    गरदनि की, गट्टोमे नहि सन्हिआ सकत

    की समय

    रचत कोनो नव इतिहास?

    की आबऽ पड़त अर्जुनकेँ फेर अपनक विरुद्ध

    लगैत अछि

    स्मृतिक मिथिलामे

    बेगरता छैक कृष्णक, जे

    फेरसँ बनथिन सारथी,

    फेरसँ विजयश्री भेटत अर्जुनकेँ

    सीताक देशमे

    लगै जेना फड़ि गेलै

    कौरव वंशक अंधता

    मुदा से कोनाकऽ टिकतै

    दिना-दिनिस एतबा बड़ अजगुत

    समयकेँ बदलबाक लेल

    जानकीकेँ उठाबहि पड़तनि

    शिवक धनुष, करहि पड़तनि प्रतिकार

    जँ एना नहि भेलै, तँ

    काल्हि अपन सन्ततिकेँ हमहूँ सभ

    सुनबऽ लेल शापित होयबे करबै, कि

    एतय रहै एकटा देश मिथिला,

    जकर राजा रहथिन जनक

    हुनके बेटी रहथिन जानकी,

    जिनकर भाषा रहनि मधुर मैथिली...!

    स्रोत :
    • पुस्तक : नहि सीता नहि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 19)
    • रचनाकार : बिभा विमर्श
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2023

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