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मेरा सलीब तो जल ही रहा है

mera salib to jal hi raha hai

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

योसिप पूपाचिच

योसिप पूपाचिच

मेरा सलीब तो जल ही रहा है

योसिप पूपाचिच

और अधिकयोसिप पूपाचिच

    मेरे संसार, गया मैं

    तेरे और मेरे दोराहे पर

    परस्पर विदा ले लें।—तू रो रहा है

    मेरा सलीब तो जल ही रहा है

    दूर हो रहा है तू बिना अभिवादन के बिना कुछ कहे बिना

    ईश्वर के

    मैं चला उसी अनजाने तारे की ओर

    बर्फ़ पड़ रही है धरती बढ़ रही है

    तू पराजित डूब रहा है

    नगर है तू, गाँव या कोई लज्जित जाति

    मधुशाला में

    मेरा सलीब तो जल ही रहा

    उठा हुआ, चढ़ा हुआ, अँधेरे से भरा हुआ

    मैं तुझे आवाज़ देता हूँ।—वह जल रहा है

    मैं तुझे आवाज़ देता हूँ।—तू काँप रहा है

    तुझ पर चिनगारियाँ छिटक रही हैं

    भयावह स्वप्न सिक रहे

    मेरे संसार व्यर्थ ही वास्तविक

    मेरे संसार व्यर्थ ही प्रेयस

    मेरे संसार

    दूर हो रहा हूँ। तेरे पीछे हाथ बढ़ा रहा हूँ।

    अतीत से प्रकट हो रहीं सेनाओं की छायाएँ

    तीरों ने हवा को रंग दिया है

    टूटा हुआ, छिन्न-भिन्न तू स्वप्न देख रहा है

    निरंतर रौंद रहा सागर को

    सदियाँ प्रकाश को दफ़ना रहीं

    पूर्वजों के घाव बढ़कर पपड़ियाँ बन चुके हैं

    भली माँ मार्गरीटा आँसू बेच रही है

    माँ मार्गरीटा

    मेरा सलीब तो जल ही रहा है

    ले जा रहा हूँ उसे—मेरा सलीब और तेरा नाम

    ले जा रहा हूँ उसे, टूटा हुआ तथापि पवित्र

    राह कहीं दीखती नहीं

    पानी जिस पर चल रहा हूँ उड़ता जा रहा है

    और मेरे नीचे भाप उमड़ रही है

    मेरा सलीब तो जल ही रहा है

    अनंत में तेरा नाम प्रदीप्त कर रहा है

    हम परस्पर दूर होते जा रहे हैं

    और जा रहे हैं दोनों एक ही अनजाने तारे की ओर

    तू डूब रहा है अपने स्वप्न में

    पर मैं क़दम बढ़ा रहा हूँ घुट रहा हूँ घुट रहा हूँ और देख रहा हूँ

    अनंत की ओर

    मेरा सलीब तो जल ही रहा है

    मेरा सलीब और तेरा नाम

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 133)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : योसिप पूपाचिच
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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