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मैं बस औरत होना चाहती हूँ

main bas aurat hona chahti hoon

ममता धवन

ममता धवन

मैं बस औरत होना चाहती हूँ

ममता धवन

और अधिकममता धवन

    एक व्यवस्था थी...

    जब काम बटे थे

    कुछ काम आदमी करते थे

    और कुछ निश्चित काम औरतें करतीं थीं

    हमने इस व्यवस्था में कई खोट निकाले

    निश्चित की गई भूमिकाओं को स्त्री विमर्श

    जेंडर भेद कहकर तोड़ डाला

    स्त्री को उसकी आइडेंटिटी की तलाश में भटका डाला

    आज एक नई व्यवस्था आ गई

    आदमी अपने काम भी कर रहा है

    औरतों के काम भी कर रहा है

    औरतें पहले के निश्चित काम भी कर रहीं हैं

    छलावे की आज़ादी की डोर पकड़े

    आदमियों वाले सारे काम भी कर रहीं है

    अब आदमी और औरत पहले से ज़्यादा

    और पहले से अधिक घँटे काम पर लगे हैं

    अब औरत न सिर्फ़ चाय का प्याला बनाती है

    बल्कि पैसे भी कमाती है

    आदमी न सिर्फ़ पैसे कमाता है

    बल्कि घर लौटकर अपनी चाय भी ख़ुद बनाता है

    वाह स्त्री विमर्श!

    स्रोत :
    • रचनाकार : ममता धवन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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