अजनबी लोगों वाला एक अजनबी लोक।
वे काल के हवाले तो हैं किंतु उसे मानते नहीं।
विरोध प्रकट करने के उनके अपने तरीक़े हैं,
वे तस्वीरें बनाते हैं, जैसे कि एक यह :
पहली नज़र में कुछ विशिष्ट नहीं।
आपको पानी नज़र आता है
आपको एक किनारा नज़र आता है
उल्टी धारा में मुशक़्क़त से रास्ता बनाती
एक नाव नज़र आती है आपको।
पानी पर पुल और पुल पर लोग नज़र आते हैं।
लोग साफ़तौर पर तेज़-तेज़ चलते नज़र आते हैं,
क्योंकि अभी-अभी शुरू हुई है मूसलाधार बारिश
एक काली घटा से।
नुक़्ता यह है कि इसके बाद कुछ घटित नहीं होता—
न घटा की शक्ल या रंग बदलता है
न ही बारिश थमती या तेज़ होती है
नाव बे-हरकत तिरती रहती है
पुल पर के लोग पल-भर पहले जहाँ थे
ठीक वहीं दौड़ रहे हैं।
यहाँ यह नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है
कि किसी भी पहलू से यह अनायास बन गई
तस्वीर नहीं है।
यहाँ काल को स्थिर कर दिया गया है
उसके नियमों की अवमानना की गई है
यहाँ आगामी घटनाओं के प्रभाव को नकारा गया है
यहाँ चीज़ों और लोगों को अपमानित किया गया है।
धन्यवाद उस विद्रोही का
उस विशिष्ट हिरोशिगे उतागावा
(एक जीव, जो चीज़ों का इस तरह घटना शुरू होने से
बहुत पहले, और बहुत स्वाभाविक तरीक़े से उठ गया)
का, कि काल लड़खड़ाया और ढेर हो गया।
मुमकिन है यह फ़ालतू की सनक ही रही हो,
महज़ दो आकाशगंगाओं को घेरती एक बेतुकी सनक,
फिर भी, इस बाबत, सनद के बतौर एक अंतिम टिप्पणी
हमें जोड़नी होगी :
यहाँ यह उचित माना गया है
कि इस छोटी-सी तस्वीर को हमें ऊँचा दर्जा देना चाहिए
प्रशंसा करनी चाहिए इसकी, और युग-युगों तक रोमांचित
होते रहना चाहिए।
किंतु कुछ लोगों के लिए इतना ही काफ़ी नहीं है
उन्हें तो बारिश का होना तक सुनाई देता है
अपनी गर्दन पर और अपने कंधों पर
वे बूँदों की ठंडक महसूस करते हैं
वे पुल को और पुल पर खड़े लोगों को इस तरह निहारते हैं
मानों अनित्य यात्रा वाले अनंत पथ पर चल रही
अपनी तरह की अनूठी और अंतहीन दौड़ में
ख़ुद अपने आपको शरीक़ वे पा रहे हों
और ढिठाई के साथ यक़ीन करते हों
कि चीज़ें दरअस्ल इसी रूप में होती हैं।
- पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 325)
- रचनाकार : वीस्वावा षिम्बोर्स्का
- प्रकाशन : मेधा बुक्स
- संस्करण : 2003
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