मैंने एक ऐसे घर के बारे में सोचा
जिसमें जड़े पत्थर यक्-ब-यक् बदले प्रतीत हुए
और उम्मीद से भरकर सजीव हो उठे—
उम्मीद वैसी ही ठोस, जैसे वे ख़ुद,
और माहौल उस प्रफुल्लित ऊष्मा से लबालब
कोमलता और प्रतीक्षातुर आत्माओं की उस गरमाहट से
उस मुस्कुराती चिंता से, जो किसी जच्चाख़ाने पर छाई रहती है।
दीवारों में कान ही कान सर्वत्र
और सारी आवाज़ें दबी हुई,
सिर्फ़ माँ को यह अधिकार कि वह कराह
या अपनी तकलीफ़ की शिकायत कर सके।
उसके बाद मेरा ध्यान समूचे जीवन जगत की ओर गया।
किसे इसकी प्रसव पीड़ा की परवाह है?
किसके पास वक़्त है कि एक स्नेही, सदय और धैर्यवान की भाँति
इसे अपना सान्निध्य दे सके?
वहाँ तो अनुर्वरता का एक भयावह शोर है
जो इस दृश्यमान शुभ घड़ी में
कुछ भी सार्थक नहीं जोड़ता,
और आने वाला समय, उस सौभाग्यशाली घर में पैदा होने वाले
शिशु के विपरीत, एक अष्टावक्र को
धरती पर उतारने के कुचक्र में लिप्त है।
अपनी माँ की कोख की नीरव गढ़न में
पहले ही यह सब जान-सुन चुका वह मनस्वी
जीवन-जगत में स्वयं को प्रस्तुत करने का
सबसे उपयुक्त रास्ता तलाश रहा है...
और, लो, अंततः उसने पा ही लिया समस्या का निदान :
इतिहास में उदित होता हुआ वह
किसी मछली की भाँति लरज़ रहा है,
नियत समय में पके एक फल की भाँति
वह धरती पर आ रहा है।
किंतु नवजात शिशु पर जमी माँ की सजल आँखों में मुस्कुराता
निसर्ग का वह कालपुरुष कहाँ है?—
जो पलटकर पुकार उठे :
‘धन्य हुआ मैं, तुम्हें जननी के रूप में पाकर!’
- पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 119)
- रचनाकार : ह्यु मैक्डायर्मिड
- प्रकाशन : मेधा बुक्स
- संस्करण : 2003
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