सब फ़ालतू चीज़ें जलकर राख हो चुकी हैं
जलना ऐसा ही महसूस होता है अंतिम बरस
के पतझड़ में, नीले अक्टूबर में झरते पत्तों जैसा नहीं
बल्कि मानो त्वचा काग़ज़ की एक फ़ानूस हो
जिसके भीतर फँसे हुए पतंगे अपने जलते पर फड़फड़ा रहे हों
और फिर भी मैं इस पहाड़ी पर तुम्हारे ठीक ऊपर लेट सकता हूँ
उस जगह से एक फ़ुट भर दूर जहाँ मैं ख़ुद लेटूँगा
जल्द ही, बहुत जल्द और इस सारे मलबे
और ढल चुके शरीर के बावजूद
अब भी महसूस कर सकता हूँ कि हम योद्धा थे
जब बाग़ में उतरती हुई सुबह की मामूली धूप भी
एक सल्तनत हुआ करती थी
कमरा 1010 के बाद
पता चला कि युद्ध केवल मौत नहीं होता
युद्ध वह छोटी-सी चीज़ है जिसे आदमी थामे रहता है
अपने घर से दूर शरणार्थी बनकर
ओह प्रिय, क्या तुम मुझे इसके लिए माफ़ करोगे
कि हर बार जब भी मैं किसी भी चीज़ का डिब्बा खोलता था
‘ग्लैड बैग्स वन-ए-डेज़ किंगसाइज़’ सबसे बदतर था
मैं यही सोचता कि क्या इस डिब्बे के ख़त्म होने तक
तुम अब भी यहीं होगे
ओह! रोजर, रोज
अब मेरे साथ खेल कौन खेलेगा
जब मैं सिसकता हुआ तुमसे लिपट जाता था
तो तुम बस उसे टाल देते और अपनी सबसे धीमी आवाज़ में
कहते कि मैं अभी यहीं हूँ
तुम्हारी घड़ी मेरे ऊपरी दराज़ में रखी है
जिसे पहनने की हिम्मत अब तक नहीं हुई
मेरी मदद करो
ये डिब्बे, किराने का सामान, यह घर
दिन पर दिन वे सब चीज़ें जो आदमी को सुथरा बनाए
रखती हैं
मगर अब क्या फ़र्क़ पड़ता है कि वे कितने दिन चलेंगी
या मैं
दिन तुम्हें अपने साथ ले गया है
और अब जो कुछ बचा है वह जलता हुआ अँधेरा है
जिसमें सिर्फ़ क़ब्र के ऊपर की हरियाली
अब भी उगी हुई है
और यह छोटी-सी बात
कि मैं इस पहाड़ी से कहता हूँ
मैं यहाँ हूँ, ओह, मैं यहाँ हूँ।
***
- रचनाकार : पॉल मोनेट
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित
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