वह मुझे लगता है देवताओं के जैसा
wo mujhe lagta hai devtaon ke jaisa
वह मुझे लगता है देवताओं के जैसा, वह शख़्स
जो भी है वह, वह जो बैठता है
तुम्हारे रू-ब-रू और क़रीब से सुनता है
तुम्हारी शीरीं बातें
और तुम्हारी दिलकश हँसी—आह, यह
मेरे सीने में धड़कते दिल को पर लगा देती है
कि जब भी मैं तुम्हें देखती हूँ, एक लम्हे के लिए भी,
लब पर कोई कोई लफ़्ज़ नहीं बचता
नहीं : ज़बान टूट जाती है और एक महीन-सी
आग जिस्म की सतह के नीचे दौड़ने लगती है
और आँखों के आगे कुछ दिखाई नहीं देता और
एक गूँज-सी भर जाती है
कानों में।
और ठंडा पसीना मुझे भिगो देता है और एक थरथराहट
मेरे वजूद को जकड़ लेती है, घास से भी ज़्यादा ज़र्द
पड़ जाती हूँ मैं और मुर्दा-सी—या लगभग ऐसी ही
मैं लगती हूँ मुझे ख़ुद।
लेकिन हर शय की जुरअत करनी होगी, क्योंकि फ़क़ीर से फ़क़ीर आदमी भी...
(यहाँ कविता का मूल पाठ खंडित हो जाता है।)
***
- रचनाकार : सैफ़ो
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित
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