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उन्मत्त कुमारी और नारकीय वर

unmatt kumari aur narakiy var

अनुवाद : शायक आलोक

ज्याँ आर्थर रम्बो

ज्याँ आर्थर रम्बो

उन्मत्त कुमारी और नारकीय वर

ज्याँ आर्थर रम्बो

और अधिकज्याँ आर्थर रम्बो

    मैं उन तमाम रूप-सज्जाओं की गवाह रही हूँ जिनसे उसने अपनी रूह में ख़ुद को घेर रखा था—लिबास, कपड़े, साज़-ओ-सामान; मैंने उसे हथियार दिए, एक नया चेहरा दिया। मैंने देखा उन सब चीज़ों को जो उसे प्रभावित करती थीं, ठीक वैसे ही जैसे उन्हें स्वयं के लिए रचना चाहता था। जब कभी उसकी रूह मुझे बुझी-बुझी लगती, मैं उसके पीछे चली जाती—बहुत दूर तक, अजीब और उलझे हुए रास्तों पर, चाहे वे भले हों या बुरे—मुझे पूरा यक़ीन था कि उसकी दुनिया में मेरा प्रवेश कभी मुमकिन नहीं होगा। उसकी उस प्रिय, सोती हुई देह के पास रात को मैंने कितने-कितने पहर जागकर गुज़ारे—यह समझने की कोशिश में कि वह हक़ीक़त से इस क़दर भागना क्यों चाहता है। ऐसी तड़प किसी और में देखी तो थी। मैं जान गई थी—उससे कोई भी ख़ौफ़ रखे बिना—कि वह समाज के लिए एक संगीन ख़तरा बन सकता है। शायद उसने अपने पास ऐसे राज़ दबा रखे हैं जो ज़िंदगी बदल दे। नहीं—मैंने ख़ुद से कहा—वह बस उनकी तलाश कर रहा है। और फिर, उसकी करुणा में एक जादू है—और मैं इसकी क़ैदी हूँ। किसी और रूह में इतनी ताक़त न होती—नाउम्मीदी की ऐसी ताक़त कि इसे झेल सके, उससे प्यार पा सके और उसकी हिफ़ाज़त में जी सके। यह भी है कि और मैं उसे किसी और रूह के साथ अपनी कल्पना में भी नहीं देख सकती : इंसान केवल अपने फ़रिश्ते को देखता है, किसी और के फ़रिश्ते को नहीं—ऐसा मैं मानती हूँ। मैं उसकी रूह में रहती थी जैसे किसी महल में, जिसे उन्होंने ख़ाली कर दिया गया हो ताकि तुम्हारे जैसे तुच्छ व्यक्ति को देख न सके : बस इतना ही। हाय! मैं उस पर कितनी निर्भर थी। पर उसे क्या दरकार थी मेरी बेरंग और सहल ज़िंदगी से? वह मुझे बेहतर नहीं बना सकता था, जब तक मुझे मार न डाले। ग़मज़दा और शर्मिंदा, मैं कभी-कभी उससे कहती :

    “मैं तुम्हें समझती हूँ।” वह बस कंधे उचका देता।

    यों, हर रोज़ मेरी खीझ के रंग बदलने के साथ, अपनी ही नज़रों में ख़ुद को अधिकाधिक बदली हुई पाती—और उन तमाम नज़रों में भी जो मुझे देखने की परवाह करतीं, अगर मैं दुनिया तमाम की चिरंतन विस्मृति के लिए अभिशप्त न होती!—मैं उसकी मेहरबानी की और भूखी होती चली गई। चुंबनों और आलिंगनों के साथ यह वाक़ई एक जन्नत थी, एक स्याह जन्नत, जिसमें मैं दाख़िल हुई और मैं जहाँ बने रहना चाहती—अभागी, बहरी, गूँगी, अंधी। मुझे इसकी आदत पड़ भी चुकी थी। मैं हमें भले बच्चों की तरह देखती, उदासी के स्वर्ग में घूमने के लिए मुक्त। हम एक-दूसरे के साथ हम-आहंग थे। गहरे जज़्बे में डूबे हुए हम साथ काम करते। लेकिन एक गहरे लम्स के बाद वो कहता : “जब मैं नहीं रहूँगा तो तुम्हें कितना अजीब लगेगा, मैं जिसके रास्ते से तुम गुज़री हो। जब मेरी बाँहें तुम्हारी गर्दन के नीचे नहीं होंगी, न मेरा दिल जिस पर तुम सो जाओ, न यह मुँह तुम्हारी आँखों पर। क्योंकि मुझे एक दिन बहुत दूर जाना होगा। और मुझे दूसरों की मदद भी तो करनी है; यह मेरा फ़र्ज़ है। भले ही यह तुम्हें कुछ ख़ास पसंद न आए... प्रिय।” अचानक मुझे मेरा भविष्य दिखा, उसके जाने के बाद, बार-बार ग़श खाती हुई, सबसे भयानक अँधेरे : मौत में गिरती हुई। मैं उससे वादा लेती कि वह मुझे कभी छोड़कर नहीं जाएगा। उसने वह वादा बीस बार किया— आशिक़ का वादा। यह उतना ही बेमानी था जितना मेरा उससे कहना :

    'मैं तुम्हें समझती हूँ।'

    (एक अंश) 

    *** 

    स्रोत :
    • रचनाकार : ज्याँ आर्थर रम्बो
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित

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