तरकश से निकले तीरों की तरह
tarkash se nikle tiron ki tarah
हम देह का क्या करें
क्या हम उसे जला दें
क्या हम उसे मिट्टी में या पत्थर में सुला दें
क्या हम उसे मरहम, शहद और तेल से लेपित करें
फिर किसी जाली में लपेट, उसे किसी बेड़े पर रखकर
छोड़ दें पानी के भरोसे? लहरों के भरोसे?
उसकी देह की स्मृति का क्या होगा,
यदि हममें से कोई अभी फ़ौरन
उसे दर्ज न कर ले शब्दों में?
वह किस तरह पिघलेगी—
नमक की तरह या ढलती हुई साँझ की तरह?
दाँतों के सूत, रबर के दस्ताने और कहीं पड़ा
किसी चबाए हुए पेन का ढक्कन?
हम उसकी छोड़ी हुई चीज़ों को
कैसे देखें, क्या हम उन्हें फेंक दें
या इस्तेमाल करते-करते ख़त्म कर दें,
क्या हम कहें कि वे अवशेष हैं
और इसलिए उनके साथ अवशेषों जैसा
व्यवहार करें? क्या उसकी मैली चादर भी
उनमें गिनी जाएगी?
अगर हाँ,
तो क्या उसे धो देना ग़लत होगा?
कोई निर्देश नहीं हैं कि उसे
उन लोगों तक पहुँचना चाहिए
जिनके पास चादर नहीं है
या हमें रात में उसे स्मृति की तरह
अपने ऊपर ओढ़ लेना चाहिए
और दिन में उसे तह किया हुआ, रखा हुआ
रिक्त देखकर उस पर विचार करना चाहिए।
यहाँ उसके बिस्तर के पीछे
फ़र्श पर एक मुड़ी हुई तस्वीर पड़ी है—क्यों?
क्या वे दोनों प्रेमी थे?
क्या जहाँ वह मिली
उससे यह पता चलता है कि
वह उसे भूल गया था या खो बैठा था
या उसे सुरक्षित रखने के इरादे से वहाँ रखा था?
क्या हमें उस दूसरे आदमी से
संपर्क करने की कोशिश करनी चाहिए?
अगर वह भी मर चुका हो तो?
या जीवित हो
लेकिन याद नहीं करना चाहता हो
मनुष्य हो?
क्या मनुष्य होना ठीक है,
और अर्पण तथा स्मृति से
धीरे-धीरे दूर हो जाना
यदि हम भूल जाते हैं,
और कभी उसे रोक नहीं सकते
और कभी वही एक चीज़ होती है
जो हम चाहते हैं?
कितनी देर लगती है इसमें
कितनी सुबहों में
कितने नए मुर्ग़ों की बाँगों में?
अगर हमें सिर्फ़ विश्राम चाहिए
और कुछ नहीं?
क्या वह कोई ऐसी चीज़ है
जिसे पाया जा सके
छोटी-सी?
वह किस बिल में छिपी है?
क्या वह शायद एक देश है?
क्या उसके लिए कोई मार्गदर्शक चाहिए होगा
जो हमें बताए कि वहाँ कैसे पहुँचना है?
क्या हम उड़कर जाएँ?
क्या हम तैरकर?
अब मैं क्या करूँ
इन अपने हाथों का?
- रचनाकार : कार्ल फ़िलिप्स
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित
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