रात के पसीनों से तर आदमी
raat ke pasinon se tar adami
मैं सिहरता हुआ जागता हूँ, मैं जो
उष्णता के सपनों में फला-फूला था,
उनके शेष अवशेष में जागता हूँ—
पसीने से तर और बदन से चिपकी हुई चादर।
मेरा जिस्म ख़ुद अपनी ढाल था;
जहाँ भी उसे चीरा लगा, वह भर भी गया।
मैं परिपक्व होता गया, जैसे-जैसे मैंने खोजा
उस जिस्म को जिस पर मुझे भरोसा था,
यहाँ तक कि जब मैं मुग्ध था
उस जोखिम पर
जो मुझे और मज़बूत बनाता था,
त्वचा को मिलने वाली हर चुनौती में
अजूबों से भरी एक दुनिया थी।
मैं अफ़सोस किए बिना नहीं रह सकता
कि वह मिली हुई ढाल दरक गई,
मेरा मन घबराहट में सिमट गया,
मेरा जिस्म टूट गया और उजड़ गया।
मुझे बिस्तर की चादर बदलनी है
मगर मैं ख़ुद को ही देखने लगा हूँ
जहाँ हूँ वहीं सीधा खड़ा,
अपने जिस्म को अपनी बाँहों में समेटे हुए
मानो उसे बचा लूँ उन पीड़ाओं से
जो मेरे आर-पार गुज़रेंगी,
मानो हाथ ही काफ़ी हों
एक हिमस्खलन को
रोक लेने के लिए।
***
- रचनाकार : थॉम गन
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित
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