मेरे पास कोई ख़ज़ाना नहीं
सोने का, जिसकी रखवाली ग्रिफ़िन करते हैं
पहले की तरह आज भी
गड़ेरिये का बाड़ा सूना पड़ा है
न माणिक मेरे पास, न मोती
कि तुम्हारे गले को सजा सकूँ
लेकिन वन-बालाएँ
गड़ेरिये की तान पर मोहित हुई हैं
तो एक नरकट तोड़ो
और मुझे अपने लिए गाने को कहो
कि मैं भर देना चाहूँगा
तुम्हारे कानों को मधुर संगीत से
तुम, जो अधिक सुंदर हो
सबसे सुंदर लिली के पुष्प से भी
ज़्यादा शीरीं और नायाब
सबसे सुगंधित कच्चे अंबर से भी।
तुम्हें किस बात का भय?
युवा हायसिंथ मारा जा चुका
पैन अब नहीं यहाँ—
और कभी लौटेगा भी नहीं
सींगों वाला फ़ॉन
अब पीले मैदानों को नहीं रौंदता
ज़ैतून के दरख़्तों से चुपके नहीं गुज़रते
अब भोर की बेला में कोई देवता
हाइलस ख़ाक हो चुका
वह कभी न पा सकेगा
तुम्हारे उन छोटे, सुर्ख़
गुलाब-पंखुड़ी जैसे होठों का रहस्य
ऊँची पहाड़ी पर
अब नहीं थिरकतीं धवल वृक्ष-देवियाँ
चाँदी-सी ख़ामोशी में
शरद का उदास दिन ढलता जाता है।
***
- रचनाकार : ऑस्कर वाइल्ड
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित
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