मैं अब उसे नींद नहीं कहती।
उसकी जगह कुछ नया खो देने का जोखिम उठा लूँगी—
जैसे कि तुमने अपना गुलाबी चाँद खो दिया था,
उसे अपनी पकड़ से छूट जाने दिया था।
लेकिन कभी-कभी, जब कोई चीज़ मेरे सींगों में अटक जाती है—
कोई विस्मय, कोई शोक या उसकी कोई पंक्ति—
तो काँपते हुए भी
उससे अपने को छुड़ाना
किसी चिपचिपे, सड़ चुके फल से हाथ छुड़ाने जैसा होता है।
तो फिर मेरी व्यग्रता को इच्छा कह लेने दो।
मुझे उसे एक बगीचा कह लेने दो।
शायद लोर्का का आशय भी यही था
जब उन्होंने कहा था—verde que te quiero verde—
क्योंकि जैसे ही रात की हरियाली उतरती है,
मैं उसी की एक भूमि बन जाती हूँ—
जहाँ हर चिंता मेरी छाती में फूल बनने को तैयार है।
अँधेरे में मेरा मन una bestia है—
बेलगाम, तप्त। और यदि प्रेमिका के कूल्हे और हल के नीचे
थकान से जुती न रहूँ तो मैं इच्छा के मैदान में
भटकती हुई एक और रात बन जाती हूँ—
उसकी नीची हरी आभा में खोई हुई,
आधी रात और भोर के बीच फैले मैदान में घंटी की तरह बजती हुई।
इस तरह अनिद्रा कुछ-कुछ वसंत जैसी होती है—
विस्मयकारी और असंख्य पंखुड़ियों वाली,
मेरे माथे पर सुनहरी टिड्डियों की उछाल और फुदकन।
चाहना के जादुई घंटों में मैं आहत होती रहती हूँ—
मुझे उसकी हरी ज़िंदगी चाहिए। उसका मेरे भीतर होना
उस हरे क्षण में जो रुकता ही नहीं।
उसकी गर्दन की हरी शिरा, मेरे मुँह में हरा पंख,
मेरी आँख में हरा काँटा। मैं उसे वैसे चाहती हूँ
जैसे नदी बहती है—मुड़ती हुई।
हरा बहता हुआ हरा, बहता हुआ।
बस इतनी ही तेज़ी से—यही होता है—
soy una sonámbula (मैं एक निद्राचारिणी हूँ।)
और जबकि आज तुमने कहा था कि अब कुछ बेहतर महसूस हो रहा है,
और जबकि इस कविता में अब बहुत देर हो चुकी है,
क्या मैं अब साफ़-साफ़ कह सकती हूँ—
कि मैं अच्छा महसूस नहीं कर रही,
कि तुमसे कह सकूँ कि मुझे एक कहानी सुनाओ
उस मीठी घास की कहानी जो तुमने उगाई थी
और सुनाती रहो—बार-बार
जब तक उसकी मीठे धुएँ-सी गंध मुझ तक न पहुँच जाए,
जब तक मैं इस रौंदे हुए मैदान से बाहर न निकल आऊँ,
और फिर से सहज न हो जाऊँ।
***
- रचनाकार : नैटली डियाज़
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित
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