मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं अपने दुःख
या अपनी ख़ुशी का कोई ब्योरा सँभालकर रखूँगी
उन मोमबत्तियों की तरह
जो तुम्हारे बालों की पूरी लंबाई के इर्द-गिर्द फैली
हवा की मुलायम जाली को
रोशन कर देती हैं—
एक वर्षा की तरह
जिसे ईश्वर ने रचा हो
भूरे और ताँबई उतार-चढ़ावों में
लपट के कणों की तरह
झिलमिल।
लेकिन अब मैं ऐसा करती हूँ
खुबानियों और पानी से भरी
एक दुपहर को
याद में वापस लाती हूँ
जिसके बीच-बीच में सिगरेटें थीं
रेत थी और वे चट्टानें
जिन पर चलते हुए हम गुज़रे थे :
कितनी सहजता से तुमने
थाम लिया था मेरा हाथ
दुनिया के निम्न ज्वार के किनारे।
अब मैं फिर से जीती हूँ
पीछे हट जाने की एक शाम
एक पुल
जिसे मैं अपने पीछे छोड़ आई
जहाँ वासना की सारी ठोस गर्मी
और कोमल थरथराहट
एक साथ
इतनी बेरहम
और इतनी मेहरबान पड़ी थी
जैसे आवेग
अपनी अनंत पलटनों में
कड़वे और मीठे के बीच
डोलता रहता है।
अकेली
और तुम्हारी तड़प में डूबी हुई
अब मैं ऐसा ही करती हूँ।
***
- रचनाकार : जून जॉर्डन
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित
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