गैरी के लिए एक दूसरा रेल-गीत
gairi ke liye ek dusra rel geet
जब रेलगाड़ियाँ अजनबी शहरों में आती हैं
तो शहर के बाशिंदे अजनबियों से मिलने चले आते हैं।
मैं तुमसे प्यार करता हूँ, जैक, उसने कहा,
मैं तुमसे प्यार करता हूँ, जैक, उसने कहा,
किसी दूसरे स्टेशन पर।
जब मुसाफ़िर अजनबी शहरों से आते हैं
तो शहर के बाशिंदे अजनबियों की मदद को निकल आते हैं।
मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ, मैंने कहा,
मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ, मैंने कहा,
किसी दूसरे स्टेशन से।
शहर के बाशिंदे गुज़रते हुए अजनबियों पर मेहरबान होते हैं,
उन्हें पनाह देते हैं और महज़ मेहरबानी से उनके होंठ चूम लेते हैं।
मैं इन बे-यक़ीन गलियों में चलता हूँ,
मैं इन बे-यक़ीन गलियों में चलता हूँ,
एक अजनबी शहर में।
रात को, ठंडे और नए बिस्तरों में, वे स्वागत पाए हुए अजनबी
याद में उस शहर के वादे को महसूस करते हैं।
मैं तुम्हारे प्यार में सोता-जागता हूँ,
मैं तुम्हारे प्यार में सोता-जागता हूँ,
पिछले बरस के एक स्टेशन पर।
फिर शहर से और उसके बाशिंदों से अलविदा कहता हूँ
कम-अज़-कम इतना तो मानता हूँ कि वे अजनबियों पर मेहरबान थे।
मैं अपना प्यार तुम्हारे पास छोड़ जाता हूँ
मैं अपना प्यार तुम्हारे पास छोड़ जाता हूँ
इस अजनबी शहर में।
***
- रचनाकार : जैक स्पाइसर
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.