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एक कला

ek kala

अनुवाद : शायक आलोक

एलिज़ाबेथ बिशप

और अधिकएलिज़ाबेथ बिशप

    खोने की कला में पारंगत होना कठिन नहीं;

    कितनी ही चीज़ें मानो इसी मंशा से भरी होती हैं

    कि खो जाएँ, कि उनका खोना कोई आपदा भी नहीं।

     

    हर दिन कुछ न कुछ खो दो। उस व्याकुलता को स्वीकार करो 

    जो दरवाज़े की चाबियाँ खो जाने से होती है या किसी घंटे के व्यर्थ चले जाने से।

    खोने की कला में पारंगत होना कठिन नहीं।

     

    फिर अभ्यास करो—दूरतर चीज़ों को खोने का, अधिक तेज़ी से खोने का :

    स्थानों और नामों को और उस जगह को जहाँ जाने का तुमने 

    इरादा किया था। इनमें से कोई भी चीज़ आपदा नहीं लाएगी।

     

    मैंने अपनी माँ की घड़ी खो दी। और देखो! मेरे प्रिय तीन घरों में से

    अंतिम या लगभग अंतिम घर भी खो दिया।

    खोने की कला में पारंगत होना कठिन नहीं।

     

    मैंने दो शहर खो दिए—वे सुंदर शहर। और उससे भी अधिक

    खो दिए कुछ प्रदेश जो मेरे थे, दो नदियाँ, एक महाद्वीप।

    मुझे उनकी कमी खलती है, पर यह कोई आपदा तो नहीं थी।

     

    —यहाँ तक कि तुम्हें भी खो देना (तुम्हारी मज़ाकिया लहज़ा,

    वह हावभाव जिसे मैं प्रेम करती हूँ)—ऐसा कहना झूठ नहीं होगा।

    प्रकट है कि खोने की कला में पारंगत होना अधिक कठिन तो नहीं

    भले वह दिख सकती है (लिख लो इसे!)—एक आपदा की तरह।

    ***

    स्रोत :
    • रचनाकार : एलिज़ाबेथ बिशप
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित

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