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लॉकडाउनमे जन-गण-मन

laukDaunme jan gan man

विकास वत्सनाभ

विकास वत्सनाभ

लॉकडाउनमे जन-गण-मन

विकास वत्सनाभ

और अधिकविकास वत्सनाभ

    जन-गण-मन सुनैत

    हमरा मोनमे रहरहाँ उठैत अछि प्रश्न

    जे एतेक नमहर चासक गण लोकनिक चिंतनमे

    जन केर चिंता कियैक भ' रहल अछि संकुचित?

    मनक बात करैत काल

    एहिसँ चिंतित कियैक नहि होइत छथि पंतप्रधान?

    मंगल ग्रहपर त' नहि जाय चाहैत अछि लोक

    त' हाकरोस करैत

    कहुना घुरय चाहैत अछि गाम

    तखन रिलीफक उकटा-पैंचीसँ फराक

    कियैक नहि होइत अछि

    जिनगी बचेबाक ठोस ओरियान?

    भक्त लोकनि एखनहुँ बजबैत छथि झालि

    राजपथक काते-काते आइ ने काल्हि

    लगबे करत पैघ-पैघ विज्ञापन

    अवसादकें अवसर बनबैत

    हमरालोकनि बनिये जायब फेरसँ विश्वगुरु

    मुदा ओहि पयर सभक चेन्ह

    जे अनचोकहि हेरा गेल अछि राजपथसँ

    जाँत नहि बान्हि देत देशक पयरमे?

    एखन कोनो हेर-फेर नहि चाहैत अछि लोक

    नाम-गामक मिलान क'

    कहुना पहुँचय चाहैत अछि अपन दलान

    घुरब होइत छैक जिनगीक लगीच आयब

    भुखायल नेनाकें

    मायक सुखायल स्तन सेहो दैत छैक संतोष

    अवसरक अभावमे

    पहिनो मरैत रहल अछि हमर भाषा

    एखन लोक मरि रहल अछि

    कोना क' बुझाबी एहि वेदनाक टीस

    साध्य होइत त' देखबितहुँ छाती फाड़ि क’

    मुदा लोक भाषासँ बेसी

    आओर अछिये की लोकभाषाक एहि कवि लग?

    स्रोत :
    • पुस्तक : नेपथ्यसँ अबैत हाक (पृष्ठ 67)
    • रचनाकार : विकास वत्सनाभ
    • प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
    • संस्करण : 2025

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