Font by Mehr Nastaliq Web

कोइली से

koili se

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

कोइली से

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    क्वैलिया! काहे मन पछिताय?

    आवा मधुर-बसंतु अकट्ठे

    जग मा गरमी फाटी

    मुसुकाने सरोज, अलि दौरे,

    चिटकी तालन माटी

    फूली कुंती जुही-न्यवारी,

    देइँ चिरैयाँ तारी,

    बढ़े मदार, जवासा लहके,

    गलिन मची सिसकारी।

    बिनु सोचे ऐसी मधुऋतु से

    जोरे प्रेमु सिहाय।

    क्वैलिया! काहे मन पछिताय?

    रबि ताती-किरनन ते फूँकिनि

    लपटन लूह जराइसि

    अरी आँब की चिर संगिनि।

    ना आँबौ किहिसि रहाइसि

    गरमी आई तोरे उप्पर,

    गलियन धूरि उड़ाइसि,

    बरिखा गगन फोरि बादर ते

    धर-धर-धार बहाइसि।

    दरपु नसाइ सुर्ज-द्यौता का

    बरिखा लिहे बोलाय।

    क्वैलिया! काहे मन पछिताय।

    पानी बरसा, जिउ ठंढाना,

    बिरवा देहीं धोइनि

    पखना साफु भये बिहँगन के

    पुरुष यँधौरी खोइनि

    ब्वालै लागी सबै चिरैया,

    जुगुनू दिया द्यखाइनि,

    साँप-किरंगा फिरैं फुंकरति,

    मासा द्याँह फुलाइनि।

    बरिखा खतम जानि भागी, रुकु

    ऐहैं फिरि ऋतुराय।

    क्वैलिया! काहे मन पछिताय।

    9 जनवरी 1952 ई.

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 49)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY