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कानी उँगलि

kani ungali

दीप्ति कुशवाह

दीप्ति कुशवाह

कानी उँगलि

दीप्ति कुशवाह

और अधिकदीप्ति कुशवाह

    मन पर कच्चा दूध चढ़ाकर

    बाँध लिया किसी ने

    अब सुबह ऐन उस वक्त होती है

    जब मैं जगाती हूँ सूरज को

    कोहनी मार के

    तभी रवाना होतीं भोर की किरणें

    उसके धूप-हस्ताक्षर लिये

    ऊब के सारे जहाजों को डुबो देती हूँ

    अपनी कानी उँगलि से

    मेरे कहने पर

    नदियाँ बढ़ा देतीं वज़ीफ़े

    खेतों के नाम

    बातिक, कलमकारी और ब्लॉक प्रिंट

    खोजती हूँ दुकानों में

    हर बार कोई चटक सिल्क दुपट्टा

    कंधे पर होता है

    अनकहियाँ पढ़ते गुज़रती हैं

    तमाम रातें

    छोटी हो चली हैं असहमतियाँ

    अब देर तक देखती रहती हूँ

    तिनके जुटाती चिड़ियों को

    निम्बोलियों का धरती को चूमना

    और सुनना

    किसी की आवाज़ में

    अपने नाम के ढाई अक्षर।

    स्रोत :
    • रचनाकार : दीप्ति कुशवाह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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