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कमरा

kamra

अनुवाद : सुरेश सलिल

ख़ैरुल अनवर

और अधिकख़ैरुल अनवर

    इस कमरे को दुनिया-जहान से जोड़ती है एक खिड़की

    उसके रास्ते अंदर दाख़िल होता चाँद

    बहुत कुछ जानना चाहता है।

    पाँच बच्चे इस कमरे में हैं। जी हाँ, पाँच!

    और उनमें से एक मैं हूँ!

    मेरी अम्मी सोई पड़ी है, सिसकियाँ भरती हुई,

    जेल में क़ैदी हरदम अकेले होते हैं

    यहाँ तक कि मेरे अब्बू भी ऊब से भरे लेटे हैं

    उनकी आँखें पत्थर से तराशे गए क्रूस के बुत पर जमी हैं।

    समूची दुनिया ख़ुदकशी पर आमादा है!

    मैं अपनी अम्मी-अब्बू से एक और

    छोटे भाई की भीख माँगता हूँ, क्योंकि वे

    गिनती में शामिल नहीं हैं :

    3×4 के, इस तरह के किसी कमरे में

    भला कैसे झेली जा सकती है ज़िंदगी!

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 300)
    • रचनाकार : ख़ैरुल अनवर
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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