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कालचक्र

kalachakr

रघुनाथ मुखिया

और अधिकरघुनाथ मुखिया

    गोरकाक समयमे

    किछु लोकसभ

    परोसि दैत रहनि

    अपन घरक जनानि सभकेँ

    ओकर चानीक थारीमे

    किएक तँ

    हुनक देह की

    थोड़बे घटि जाइत रहनि

    मुदा बढ़ि जाइत रहनि

    बिनु किछु बेचने

    हुनक तिजौरीमे सोन चानीक भार

    आ, नमरि जाइत रहनि हुनक खेत-पथार

    छिड़िया जाइत रहनि हुनक नाम

    चान-सुरुजक इजोत जकाँ

    भारतसँ विलायत धरि

    आ, ओकरा गेलाक बाद

    एतुक्का बोनिहारिन जनानी सभसँ

    ओसुली भेलै सुदिक-सूदि

    अल्हुआक कन्दसँ

    गडुआ, कौनी, साम, कोदो

    आ, खुद्दीक रोटी सभसँ

    बदलल जाय लागल रहै

    बोनिहारिन जनानीक अंग-प्रत्यंग

    आ, एखन पंचायत प्रतिनिधि

    किछु अदला-बदली करबाक लेल

    बी.पी.एल., अन्त्योदय, आवास पेंशन लाभसँ

    दहाबोर कऽ देबाक शर्तपर

    भिक्षु वेषमे, हाथ जोड़ने

    देह तकैत, आँखि निपोड़ने

    ठिठिआइत ठाढ़ अछि

    एकटा नवयौवना मसोमातक ड्योढ़ीपर।

    स्रोत :
    • पुस्तक : झुझुआन होइत गाम (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 20)
    • रचनाकार : रघुनाथ मुखिया
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2018

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