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कल

kal

ऋत्विक्

और अधिकऋत्विक्

    कितना भयानक शब्द है—

    कल

    बिल्कुल मृत्यु की तरह।

    शाम ढलेगी

    रात बीतेगी,

    और उसके बाद आएगा—

    कल

    जैसे आती है मृत्य।

    (अनिवार्य है)

    हर शाम/रात के बाद

    कल आता है—

    सब सामान सूटकेस में बाँधकर—

    वही ऊब

    वही कशमकश

    वही ऊहापोह

    वही जीवन

    वही ऊलजलूल कार्य।

    चलता जाता है

    जीवन

    मशीन की तरह

    जैसे

    किसी ने इसे

    ऑन करके छोड़ दिया हो

    संसार-क्षेत्र में।

    मैं? हाँ मैं!

    बीते हुए 'आज'

    और आने वाले 'कल' के बीच बैठा

    मध्य-रात्रि को

    सोचता हूँ

    जाने क्या? जाने क्या?

    मैं सोचता हूँ

    कभी बहुत कुछ

    कभी थोड़ा-बहुत

    कहते है पंडितजन—

    सोचने के कहाँ पैसे लगते हैं?

    मैं सोचता हूँ

    हृदय पर हुए

    वज्रपात के बारे में

    युद्ध में हुए

    रक्तपात के बारे में

    कभी सारी

    कायनात के बारे में

    तो कभी

    आत्मघात के बारे में।

    मैं बीते हुए आज

    और आने वाले कल

    के बीच बैठा

    मध्यरात्रि को

    सोचता हूँ

    जीवन के

    प्रभात के बारे में।

    मैं सोचता हूँ

    किंतु

    शाम ढलती है

    रात बीतती है

    और

    उसके बाद आता है

    कल

    जैसे आती है मृत्यु।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ऋत्विक्
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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