जीवितों और मृतकों के बीच
jiviton aur mritkon ke beech
अगर जीवन को जीते रहने के सिवा जीवन में कुछ और है
तो हमें भीतर हो रही हलचल से पता होगा, है न
जैसे तात्कालिकता की एक तेज़ गुनगुनाहट
या रात-दिन हमारे अंतर्घट का एक उद्दीपन?
लेकिन चूँकि हम सिर्फ़ बैठते हैं या खाते हैं और फिर
पाख़ाने चले जाते हैं या हमबिस्तर होते हैं और कपड़े पहनते हैं,
क्या तुम निराश हो? क्या तुम बग़ावत करना चाहते हो?
क्या तुम कोई विरोध-पत्र लिखोगे?
काश मैं जान पाता कि मैं क्या कह सकता था
मैं कितना उदास हूँ और इसलिए लिख मारता हूँ
और छोड़ देता हूँ लिखे हुए को दूसरों के लिए
ताकि वे उस पर विचार कर सकें कि वह
जीवितों और मृतकों के बीच
कोई रिश्ता बनाएगा
- पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
- संपादक : अविनाश मिश्र
- रचनाकार : डेविड इग्नटाओ
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