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जीवन : नीच आ ऊँच

jivan ha neech aa uunch

मधुकर गंगाधर

मधुकर गंगाधर

जीवन : नीच आ ऊँच

मधुकर गंगाधर

और अधिकमधुकर गंगाधर

    हमर बहुत पुरान अप्पन कोठरी

    साँझुक पीलिया-ग्रस्त घड़ीमे

    कोयलाक धुआँसँ भरि गेल अछि।

    एकरा तीनटा खिड़की छैक—

    तीनू फुजल।

    सामनेक खिड़कीपर

    लोहाक छऽड़ लागल छैक

    हम बाहर देखैत छी—

    कारपोरेशनक नऽल पर स्त्रीगनक भीड़

    भीड़सँ उपजैत अछि कोलाहल

    नर-नारीक गोपन सम्बन्धक उजागरि गारि।

    बाम भागक खिड़कीसँ देखैत छी—

    मकानक दुइ कतारक पृष्ठ-भाग

    बीचक खाली जगहपर अवस्थित

    डस्टबीन, कूड़ा, कुकुर।

    तेसर खिड़कीसँ देखैत छी—

    ताड़क कारी मनहूस, भुतहा गाछ।

    कोयलाक धुआँ तेज भऽ रहल अछि

    दम घुटल जा रहल अछि

    सोचैत छी—

    हमरा चारूकातक दुनियामे

    कोलाहल गारि अछि

    डस्टबीन अछि, कूड़ा अछि

    यैह हम छी, हमर जीवन अछि।

    हे भगवान! मृत्यु दिअऽ!

    ***

    हमर बहुत पुरान अप्पन छत अछि

    जतऽ हम ठाढ़ छी

    जोर-जोरसँ सांस खीचैत छी—

    एतुक्का बसात स्वच्छ अछि।

    एतेऽसँ सम्पूर्ण मोहल्ला लगैत अछि

    चित्रकारक लेंडस्केप जकाँ।

    नलक कातक स्त्रीगनक स्वर

    क्षीण भऽ गेल अछि—

    जेना कोनो सामूहिक उत्सवक संदर्भें,

    आङुर-गनल शब्दक माध्यमे

    परामर्श भऽ रहल अछि।

    मकानक कतारक बीच

    डस्टबीन, कूड़ा कुकुर...

    कोनो दस्तायवस्की, कोनो प्रेमचन्दक

    औपन्यासिक विवरण जकाँ सुपाठ्य छैक।

    निस्तब्ध ताड़ गाछक

    सम्हारल केश-राशिक पृष्टभूमिमे

    चन्द्रमाक काव्यमय उदय भऽ रहल अछि।

    यैह हम छी। हमर जीवन अछि।

    हे भगवान। आउ, जीबू।

    स्रोत :
    • पुस्तक : मैथिलीक नव कविता (पृष्ठ 122)
    • संपादक : रामकृष्ण झा ‘किसुन’
    • रचनाकार : मधुकर गंगाधर
    • प्रकाशन : राष्ट्रीय सार्वजनिक मेला समिति, सुपौल (बिहार)
    • संस्करण : 1971

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