हमर ई बहुत पुरान अप्पन कोठरी
साँझुक पीलिया-ग्रस्त घड़ीमे
कोयलाक धुआँसँ भरि गेल अछि।
एकरा तीनटा खिड़की छैक—
तीनू फुजल।
सामनेक खिड़कीपर
लोहाक छऽड़ लागल छैक
आ हम बाहर देखैत छी—
कारपोरेशनक नऽल पर स्त्रीगनक भीड़
आ भीड़सँ उपजैत अछि कोलाहल
नर-नारीक गोपन सम्बन्धक उजागरि गारि।
बाम भागक खिड़कीसँ देखैत छी—
मकानक दुइ कतारक पृष्ठ-भाग
बीचक खाली जगहपर अवस्थित
डस्टबीन, कूड़ा, कुकुर।
तेसर खिड़कीसँ देखैत छी—
ताड़क कारी मनहूस, भुतहा गाछ।
कोयलाक धुआँ तेज भऽ रहल अछि
आ दम घुटल जा रहल अछि
आ सोचैत छी—
हमरा चारूकातक दुनियामे
कोलाहल आ गारि अछि
डस्टबीन अछि, कूड़ा अछि
यैह हम छी, हमर जीवन अछि।
हे भगवान! मृत्यु दिअऽ!
***
हमर ई बहुत पुरान अप्पन छत अछि
जतऽ हम ठाढ़ छी आ
जोर-जोरसँ सांस खीचैत छी—
एतुक्का बसात स्वच्छ अछि।
एतेऽसँ सम्पूर्ण मोहल्ला लगैत अछि
चित्रकारक लेंडस्केप जकाँ।
नलक कातक स्त्रीगनक स्वर
क्षीण भऽ गेल अछि—
जेना कोनो सामूहिक उत्सवक संदर्भें,
आङुर-गनल शब्दक माध्यमे
परामर्श भऽ रहल अछि।
मकानक कतारक बीच
डस्टबीन, कूड़ा आ कुकुर...
कोनो दस्तायवस्की, कोनो प्रेमचन्दक
औपन्यासिक विवरण जकाँ सुपाठ्य छैक।
निस्तब्ध ताड़ गाछक
सम्हारल केश-राशिक पृष्टभूमिमे
चन्द्रमाक काव्यमय उदय भऽ रहल अछि।
यैह हम छी। हमर जीवन अछि।
हे भगवान। आउ, जीबू।
- पुस्तक : मैथिलीक नव कविता (पृष्ठ 122)
- संपादक : रामकृष्ण झा ‘किसुन’
- रचनाकार : मधुकर गंगाधर
- प्रकाशन : राष्ट्रीय सार्वजनिक मेला समिति, सुपौल (बिहार)
- संस्करण : 1971
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