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जिस्म ने क्या कहा

jism ne kya kaha

अनुवाद : शायक आलोक

राफ़ाएल काम्पो

राफ़ाएल काम्पो

जिस्म ने क्या कहा

राफ़ाएल काम्पो

और अधिकराफ़ाएल काम्पो

    अभी बहुत अरसा नहीं हुआ, जब मैंने मेडिसिन की पढ़ाई की।

    यह ख़ौफ़नाक था, जो जिस्म मुझे बताता था।

    मैं किसी दूसरे शख़्स के मुँह के भीतर देखता

    और दुनिया की वीरानी पाता।

    मैं उसके जननांग देखता और गुनाह के बारे में सोचता।

     

    क्योंकि मेरा जिस्म अजनबी की ज़बान बोलता है

    मैं उन इशारों और निगाहों को कभी समझ नहीं पाया।

    मेरे माँ-बाप ने मुझे अपनी बाँहों में बसाया था और फिर भी

    मुझे लगता है मैंने उन्हें मायूस किया है; वे परवाह करते हैं

    और घूरते रहते हैं, सिर हिलाते हैं, अपनी तीर्थयात्रा करते हैं

    मेरे दिल में किसी दूर की जगह की ओर और रो पड़ते हैं।

    मैं उनके पराए शख़्स वाले मुँहों के भीतर देखता हूँ

    और रूहों का नम भीतरी हिस्सा पाता हूँ।

    वहाँ भीतर गर्मी है और सुर्ख़ी—

    प्रेम की तरह, जिसमें दाँत भी हैं।

    मैंने मेडिसिन की इतनी पढ़ाई की कि रो पड़ा 

    और रोता रहा पूरी रात।

     

    कुछ ख़ास किताबों के ज़रिए

    एक सचाई खुलती चली जाती है।

    एनाटोमी और फिजियोलॉजी,

    ज़बान के वे नन्हे-नन्हे संवेदी अवयव—

    हर बेनाम कोशिका इसकी ज़रूरतों को पूरा करती हुई।

    यह अजब था

    जो जिस्म मुझे बताता था।


    स्रोत :
    • रचनाकार : राफ़ाएल काम्पो
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित

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